टपकेश्वर महादेव मंदिर: जहां शिवलिंग पर आज भी टपकती हैं जल की बूंदें, महाभारत काल से जुड़ा है इतिहास
देहरादून में स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर सबसे पुराने और चमत्कारी मंदिरों में से एक माना जाता है. यहाँ प्राकृतिक शिवलिंग पर चट्टान से निरंतर पानी की बूंदें टपकती रहती हैं.
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देहरादून में टोंस नदी के किनारे गुफा में स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर सबसे पुराने और चमत्कारी मंदिरों में से एक माना जाता है. मान्यता है कि मंदिर में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग पर चट्टान से निरंतर पानी की बूंदें टपकती रहती हैं.
‘टपकेश्वर’ नाम के पीछे क्या है कहानी?
'टपकेश्वर' शब्द 'टपक' (पानी गिरना) और 'ईश्वर' (भगवान शिव) से मिलकर बना है. गुफा के अंदर स्थित मंदिर में पहाड़ से पानी की बूंदें लगातार शिवलिंग पर टपकती रहती हैं, जिसे देखकर हर भक्त शिव भक्ति में लीन हो जाता है. महाभारत काल से जुड़े इस मंदिर की कहानी बेहद रोचक है.
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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी किया मंदिर का उल्लेख
सोमवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर को लेकर विचार व्यक्त किए हैं. सीएम ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक भव्य वीडियो पोस्ट कर लिखा, "देहरादून में मौजूद 'टपकेश्वर महादेव मंदिर' लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है. यह पवित्र जगह न सिर्फ अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए बल्कि अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी मशहूर है. यहां मौजूद पवित्र शिवलिंग पर गुफा की छत से लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं. देहरादून आने पर इस दिव्य मंदिर के दर्शन जरूर करें."
महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जोड़ा जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु आचार्य द्रोण इसी स्थान पर गुफा में निवास करते थे, जिस वजह से इसे 'द्रोण गुफा' भी कहते हैं.
ऐसी मान्यता है कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का जन्म यहीं हुआ था और उन्होंने यहां छह महीने तक कठोर तपस्या करके भगवान शिव से दिव्य अस्त्र और आयु प्राप्त किया था. एक समय जब द्रोणाचार्य आर्थिक तंगी के कारण अपने नवजात शिशु अश्वत्थामा को दूध नहीं पिला सके, तो बालक अश्वत्थामा ने भगवान शिव की तपस्या की थी. तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिवलिंग से दूध की धारा टपकने का आशीर्वाद दिया, जिससे अश्वत्थामा की भूख शांत हुई. समय बीतने के साथ वह दूध की धारा धीरे-धीरे जल की बूंदों में बदल गई, जो आज भी निरंतर टपकती रहती है.
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महाशिवरात्रि के पर्व पर यहां एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें देश-विदेश से हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं.