उत्तराखंड का अनोखा मंदिर, जहां चिट्ठियों में लिखी जाती है फरियाद और घंटियों से गूंजता है न्याय का दरबार
अल्मोड़ा जिले में स्थित है गोलू देवता का मंदिर इसकी मान्यत है कि जिन्हें कहीं न्याय नहीं मिलता, वे गोलू देवता के दरबार में आते हैं. भक्त अपनी समस्याएं, मुकदमे, स्वास्थ्य या घरेलू परेशानियां एक कागज, सादे खत या यहाँ तक कि स्टाम्प पेपर पर लिखकर मंदिर में लटका देते हैं. मनोकामना पूरी होने या न्याय मिलने पर भक्तगण मंदिर में आभार स्वरूप पीतल की घंटियां और घंटे चढ़ाते हैं.
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देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवी-देवताओं का वास माना जाता है. इसी धरा पर एक ऐसा मंदिर हैं, जहां पर श्रद्धालु अपनी अर्जी लेकर आते हैं और कहा जाता है कि यहां पर मांगी गई हर मन्नत पूरी भी होती है. हम बात कर रहे हैं कुमाऊं के प्रसिद्ध गोलू देवता की. अल्मोड़ा जिले में स्थित गोलू देवता मंदिर अपनी हजारों चिट्ठियों और घंटियों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से न्याय मांगने वाले की सुनवाई खुद गोलू देवता करते हैं और उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाते.
सीएम धामी ने भी बताया मंदिर का महत्व
बुधवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर की खासियत पर जोर दिया बल्कि यह भी बताया कि उत्तराखंड सरकार मंदिर के लिए काम कर रही है. उन्होंने लिखा, "अल्मोड़ा में मौजूद चितई गोलू देवता मंदिर गहरी आस्था, लोक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं का एक बड़ा केंद्र है. देशभर से भक्त न्याय के देवता माने जाने वाले गोलू देवता के दरबार में अपनी दिली मुरादें मांगने आते हैं और अपनी भक्ति और आस्था दिखाने के लिए घंटियां चढ़ाते हैं."
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उन्होंने लिखा, "हमारी सरकार भी गोलू देवता मंदिर के प्लान्ड और होलिस्टिक डेवलपमेंट को पक्का करने के लिए मानसखंड मंदिर माला मिशन के तहत समर्पण भाव के साथ काम कर रही है. साथ ही, मंदिर को गोलू सर्किट से जोड़ने की कोशिशें चल रही हैं, जिससे इस इलाके में धार्मिक और सांस्कृतिक टूरिज्म को और बढ़ावा मिलेगा. अल्मोड़ा आने पर चितई गोलू देवता मंदिर में जरूर माथा टेकें."
कौन हैं गोलू देवता?
इन्हें भगवान शिव (गौर भैरव) का अवतार और कई मान्यताओं में कृष्ण का अंश माना जाता है. इन्हें कुमाऊं का 'राजवंशी देवता' और त्वरित न्याय करने वाला भगवान माना जाता है. गर्भगृह में उनकी प्रतिमा श्वेत घोड़े पर सवार, हाथों में धनुष-बाण लिए हुए एक वीर योद्धा के रूप में सुसज्जित है.
लोककथाओं के अनुसार, गोलू देवता कत्यूरी राजवंश के राजा झाल राय और रानी कलिंगा (या कलिंग्या) के पुत्र थे. जन्म के समय राजा की अन्य ईर्ष्यालु रानियों ने बालक को एक पत्थर (सिल-बट्टे) से बदल दिया और उसे बहते पानी में फेंक दिया.
न्याय की आस लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालु
एक निःसंतान लकड़हारे ने उस बालक को सुरक्षित बाहर निकाला और पाला-पोसा. बड़ा होने पर बालक को अपनी सच्चाई का ज्ञान हुआ और उसने अपनी सौतेली माताओं के षड्यंत्र का पर्दाफाश कर न्याय प्राप्त किया. तभी से वे न्याय के प्रतीक बने.
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ऐसा विश्वास है कि जिन्हें कहीं न्याय नहीं मिलता, वे गोलू देवता के दरबार में आते हैं. भक्त अपनी समस्याएं, मुकदमे, स्वास्थ्य या घरेलू परेशानियां एक कागज, सादे खत या यहाँ तक कि स्टाम्प पेपर पर लिखकर मंदिर में लटका देते हैं. मनोकामना पूरी होने या न्याय मिलने पर भक्तगण मंदिर में आभार स्वरूप पीतल की घंटियां और घंटे चढ़ाते हैं, जिसके कारण इन मंदिरों में हजारों-लाखों घंटियां लटकी दिखाई देती हैं.