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बंगाल में लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन में दो फाड़, अब होगा बहुकोणीय मुकाबला, BJP–TMC में से किसे हो सकता है फायदा?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बहुकोणीय मुकाबला होने वाला है. कांग्रेस और लेफ्ट का गठबंधन टूट गया है. इस दौरान मुस्लिम वोटों की लड़ाई भी बढ़ गई है. दावेदार भी कई हो गए हैं. वहीं ममता के सॉफ्ट हिंदुत्व से मुसलमान TMC से नाराज़ बताए जा रहे हैं.

Suvendu Adhikari / Mamata Banerjee (File Photo)
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पश्चिम बंगाल में होने वाला विधानसभा चुनाव साल का सबसे बड़ा चुनाव और मुकाबला होने वाला है. ममता बनर्जी के लिए एक ओर जहां सत्ता बचाने की चुनौती है, तो बीजेपी के लिए पैर जमाने के साथ-साथ ममता स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स से निपटने की लड़ाई है. वहीं कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के बीच नंबर तीन या दोनों में सबसे बड़ी पार्टी कौन बनेगी, इसे लेकर भी मुकाबला है.

बंगाल में एक बार फिर जोरदार मुकाबला होने वाला है. कांग्रेस की बद से बदतर होती स्थिति और ममता से लड़ने को लेकर अस्पष्टता ने लेफ्ट पार्टियों को ‘एकला चलो रे’ की नीति अपनाने पर मजबूर कर दिया है. आपको बता दें कि बंगाल में कांग्रेस ने लेफ्ट का साथ छोड़कर सभी सीटों पर ममता बनर्जी के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है. हालांकि इस फैसले का नुकसान किसे होगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन मौजूदा हालात देखें तो कहा जा रहा है कि इनके साथ लड़ने या अलग होने से ममता और बीजेपी पर खास फर्क नहीं पड़ेगा. क्योंकि ये पार्टियां कैडर-बेस्ड पार्टियां हैं और इनके वोट बैंक अब भी काफी हद तक सुरक्षित हैं.

एक ओर जहां ममता ने लेफ्ट और कांग्रेस के वोटों के सहारे अपनी सत्ता मजबूत की, वहीं बीजेपी को गैर-लेफ्ट और गैर-TMC वोटों का फायदा मिला. क्योंकि यह बड़ा तबका TMC को वोट नहीं देना चाहता था. जहां तक लेफ्ट कैडर की बात है, तो वे ममता को हटाने के लिए बीजेपी को वोट कर रहे थे, वहीं कांग्रेस को वोट देना भी कांग्रेस को समर्थन देने जैसा ही माना गया.

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ज्ञात हो कि पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) CPI(M) के राज्य नेतृत्व की ओर से आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बार-बार की गई एकता की कोशिशों पर कोई जवाब नहीं दिया. इसके बाद दोनों दलों के बीच बंटवारा तय माना जा रहा था और अंततः वही हुआ.

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इससे यह भी साफ हो गया है कि विपक्षी दलों का गठबंधन, जिसे तीन साल से भी कम समय पहले बड़े जोर-शोर से इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (INDIA) ब्लॉक के रूप में पेश किया गया था, पश्चिम बंगाल में सफल नहीं हो पाएगा.

क्या बहुकोणीय मुकाबले का बीजेपी को मिलेगा फायदा?

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अब राज्य में कई दलों के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलेगा, जिसका फायदा मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिल सकता है. राज्य की 80 से 90 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटरों का असर पड़ सकता है, जबकि 40 से 50 सीटों पर वे निर्णायक भूमिका में हैं. यह जनसांख्यिकीय स्थिति राज्य की राजनीति को काफी प्रभावित करती है और कई राजनीतिक दल इसका लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं. अब तक मुस्लिम वोटरों का झुकाव राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की ओर रहा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस समुदाय के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं भी शुरू की हैं.

ममता की नई सॉफ्ट हिंदुत्व नीति से मुस्लिम नाराज़?

हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हालिया ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर झुकाव अल्पसंख्यक वोटों में बंटवारे की वजह बन सकता है. राज्य में सरकारी खर्च से बने बड़े और चर्चित मंदिरों का उद्घाटन करना और दुर्गा पूजा आयोजकों को सरकारी फंड से उदार मदद देना, भाजपा से बहुसंख्यक समुदाय को दूर रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

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 हुमायूं कबीर भी साबित हो सकते हैं अहम फैक्टर!

इस बार होने वाले विधानसभा चुनावों में कई राजनीतिक पार्टियों के मैदान में उतरने की संभावना है, जो खुले तौर पर धर्म के आधार पर अपनी राजनीतिक ताकत दिखा रही हैं. तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर ने जनता उन्नयन पार्टी (JUP) की शुरुआत की है. वे बाबरी मस्जिद की करोड़ों रुपये की प्रतिकृति बनवाने को लेकर चर्चा में रहे हैं. उनका मकसद चुनाव नतीजों के बाद किंगमेकर की भूमिका निभाना है.

जहां ममता बनर्जी के हालिया कदम उन्हें अपने पारंपरिक वोट बैंक से कुछ हद तक दूर कर सकते हैं, वहीं हुमायूं कबीर के पीछे मुस्लिम वोटों का एकजुट होना जरूरत पड़ने पर चुनाव बाद गठबंधन बनाने में मददगार हो सकता है.

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मौलवी पीरजादा अब्बास सिद्दीकी भी एक्टिव

इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) भी फिर से सक्रिय है. इस पार्टी की स्थापना फुरफुरा शरीफ सूफी दरगाह के मौलवी पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले की थी. उस समय पार्टी ने कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. इस बार भी पार्टी का दावा है कि वह राज्य में मुसलमानों और दलितों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ की लड़ाई लड़ेगी.

AIMIM ने उड़ाई ममता और कांग्रेस की नींद

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उधर, हैदराबाद स्थित AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, बिहार के मुस्लिम-बहुल इलाकों में पिछले साल मिली सफलता के बाद अब पश्चिम बंगाल की राजनीतिक जमीन परखने की तैयारी में हैं. हुमायूं कबीर इस्लामिक पार्टियों के संभावित गठबंधन पर जोर दे रहे हैं, ताकि चुनाव के बाद उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ सके. इसी बीच विपक्ष में फूट तब और साफ हो गई, जब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी की जगह शुभंकर सरकार को नियुक्त किया गया.

TMC का समर्थन कर सकती है AIMIM?

जहां पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ममता बनर्जी के कड़े विरोधी माने जाते थे, वहीं मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष को अपेक्षाकृत नरम रुख वाला नेता माना जा रहा है. इसी सोच के चलते कांग्रेस ने आखिरकार लेफ्ट फ्रंट और ISF के साथ अपना गठबंधन तोड़ने का फैसला किया. पार्टी के भीतर एक बड़े वर्ग का मानना था कि इस गठबंधन से कांग्रेस को नुकसान हुआ और पार्टी और कमजोर हुई.

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गुटबाजी, संगठन और खिसकता जनाधार-कांग्रेस का हाल खराब

पिछले चुनावों में इस गठबंधन से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं मिला. बाद में जब तृणमूल कांग्रेस से बातचीत हुई, तो उसने केवल बहुत सीमित सीटों पर समझौते की पेशकश की. 2025 से अब तक हुई कई राजनीतिक घटनाओं और संकेतों से यह साफ हो गया कि बंटवारा तय है. इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस ने सभी 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. इसी बीच CPI(M) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम की हाल ही में हुमायूं कबीर से मुलाकात भी चर्चा में रही.

अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल के बहरामपुर लोकसभा क्षेत्र से लगातार पांच बार सांसद रह चुके हैं और 17वीं लोकसभा में कांग्रेस के नेता भी थे. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान से हार का सामना करना पड़ा.

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2021 में साथ लड़े लेफ्ट-कांग्रेस, फिर भी रहे जीरो

राज्य कांग्रेस के एक धड़े ने अधीर रंजन चौधरी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ाया है. हालांकि यह साफ नहीं है कि पार्टी अपने दम पर कितनी सीटें जीत पाएगी. खुद चौधरी अभी बिना किसी आधिकारिक घोषणा के इस भूमिका को लेकर हिचकिचा रहे हैं. हालांकि संभावना है कि वे विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं, खासकर मुर्शिदाबाद जिले से. 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन 294 सदस्यीय विधानसभा में एक भी सीट जीतने में नाकाम रहा था, जबकि उनकी सहयोगी पार्टी ISF को सिर्फ एक सीट मिली थी.

I.N.D.I.A गठबंधन दो फाड़

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कुल मिलाकर, INDIA गठबंधन, जिसमें कांग्रेस, CPI(M), DMK, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिवसेना (UBT) और RJD सहित 28 विपक्षी दल शामिल हैं, 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद लगातार झटकों का सामना कर रहा है. इसके बाद महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में भी उसे हार मिली, जिससे यह गठबंधन धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिख रहा है. हालांकि पश्चिम बंगाल में भाजपा इस राजनीतिक स्थिति का कितना फायदा उठा पाएगी, यह अभी साफ नहीं है. राज्य में उसके पास न तो कोई मजबूत क्षेत्रीय नेता है और न ही पूरी तरह एकजुट पार्टी संगठन.

क्या है फिलहाल लेफ्ट का देश में हाल?

बंगाल विधानसभा में लेफ्ट फ्रंट की शून्य सीटें हैं, जबकि यही लेफ्ट 1977 से 2011 तक बंगाल की सत्ता में रहा.

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2023 में त्रिपुरा विधानसभा में 11 सीटें जीतीं, जबकि 2013 में 49 सीटें जीतकर लेफ्ट ने जीत की हैट्रिक बनाई थी.

केरल में 2024 में एक सांसद बना, जबकि 2004 में 20 में से 18 सीटें जीती थीं, और 1967 में 19 सीटें. (राज्य में 10 साल की वाम सरकार अब एंटी-इनकंबेंसी से जूझ रही है.)

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लोकसभा में फिलहाल सिर्फ 6 सीटें हैं, जबकि 2004 के चुनाव में लेफ्ट ने 60 सीटें जीती थीं और UPA का अहम साझेदार बना था.

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