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यूपी में कांग्रेस के कार्यकारी नहीं, असली अध्यक्ष होंगे इमरान मसूद! क्या है राहुल गांधी का असली गेम प्लान?
यूपी में अजय राय जैसे तेज-तर्रार चेहरे को हटाकर इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना बताता है कि कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों के लिहाज से बड़ा दांव खेला है. यह वो रणनीति है जिसकी गूंज आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान सुनाई देगी.
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उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपने परंपरागत वोट बैंक को वापस लाने, सवर्णों में सेंध लगाने और सपा पर दबाव बढ़ाने के लिए बड़ा दांव चला है. कांग्रेस ने यूपी में अपने सबसे सक्रिय और तेज-तर्रार अध्यक्ष अजय राय को हटाते हुए आराधना मिश्रा 'मोना' को प्रदेश अध्यक्ष और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है. राजनीतिक हलकों में अटकलें हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि राय से नेतृत्व लेकर आराधना मिश्रा को कमान देनी पड़ी और एक फुल टाइम अध्यक्ष की नियुक्ति के बावजूद कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति की गई. इतना ही नहीं, अब तक अध्यक्ष के साथ-साथ अगर कोई पद होता था, तो प्रदेश उपाध्यक्ष का पद होता था, न कि कार्यकारी अध्यक्ष का. होता तो यह था कि अगर अध्यक्ष नहीं है, तो फिर कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाता था, वो भी तब तक, जब तक कि प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता.
यूपी कांग्रेस की असली ताकत अब इमरान मसूद के हाथों में!
ऐसे में देखा जाए तो कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने मोना मिश्रा की नियुक्ति तो बस दिखाने के लिए की है, असल में प्रदेश अध्यक्ष की कमान इमरान मसूद के हाथ में होगी. आराधना मिश्रा भले ही अध्यक्ष होंगी, लेकिन चलेगी इमरान मसूद की. अगर मसूद को सीधे प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाता, तो वैसे ही मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप झेल रही पार्टी पर एक बार फिर हमला शुरू हो जाता और बीजेपी, कांग्रेस को फिर से मुस्लिम लीग कहना शुरू कर देती, जिससे आगामी विधानसभा चुनाव में सीधे तौर पर हिंदू-मुस्लिम का ध्रुवीकरण हो जाता.
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इस लिहाज से देखें, तो प्रदेश की राजनीति में हॉटकेक बने मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए कांग्रेस ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है. हाल ही में अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर आराधना मिश्रा को नया अध्यक्ष और इमरान मसूद को 'कार्यकारी अध्यक्ष' (Working President) बनाने का फैसला महज एक सांगठनिक बदलाव नहीं है, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह कांग्रेस आलाकमान की नपी-तुली और सोची-समझी रणनीति है.
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इमरान मसूद के लिए कांग्रेस ने नया पद क्रिएट किया?
सियासी हलकों में चल रही अटकलों की मानें, तो यूपी कांग्रेस में बदलाव और अजय राय को हटाने का फैसला ऐसे ही नहीं लिया गया. इसमें कोई शक नहीं है कि अजय राय ने बीजेपी को जमकर घेरा है. वो फायरब्रांड नेता भी हैं और उस पार्टी की कमान संभाल रहे थे, जिसका प्रदेश संगठन मर चुका है, जमीनी ताकत नहीं बची है, जो बचे हैं वो या तो प्लांटेड हैं, कंप्रोमाइज्ड हैं या फिर जिनका सूरज अस्त हो चुका है. ऐसे में उस प्रदेश यूनिट में जान फूंकने वाले अजय राय को हटाने का फैसला पार्टी की छटपटाहट का नजरिया है. इस फेरबदल को यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव, 2013 की तरह ध्रुवीकरण के खतरे और मुस्लिम वोट बैंक पर दोबारा एकाधिकार जमाने की कांग्रेस की जोरदार कोशिश के नजरिए से देखा जा रहा है.
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मसूद को कांग्रेस ने क्यों बनाया कार्यकारी अध्यक्ष?
देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्य का प्रदेश अध्यक्ष होना अपने आप में बड़ी बात है. कांग्रेस चाहती तो इमरान मसूद को प्रदेश अध्यक्ष बना सकती थी, लेकिन उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और पर्दे के पीछे से सत्ता चलाने की छूट दे दी गई. हालांकि, अध्यक्ष आराधना मिश्रा 'मोना' को ही बनाया गया है. इसकी अपनी वजह है. सवाल यह भी पूछे जा रहे हैं कि जब कांग्रेस को मुस्लिम वोटों की इतनी ही दरकार थी, तो इमरान मसूद को सीधे प्रदेश अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया गया? इसके पीछे का जवाब हैं यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ.
कहा जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व की पिच पर अगर कांग्रेस इमरान मसूद को सीधे सबसे बड़ा चेहरा बनाती, तो भाजपा को ध्रुवीकरण का सीधा मौका मिल जाता. दूसरी तरफ, अजय राय और इमरान मसूद के बीच का समीकरण भी असहज था. मसूद, अजय राय के नीचे काम करने को तैयार नहीं थे और राय, मसूद की बात सुनने को राजी नहीं थे.
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अजय राय के रहते भी तो कार्यकारी अध्यक्ष बन सकते थे मसूद, फिर क्यों नहीं?
कांग्रेस ने अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया, आराधना मिश्रा को नया अध्यक्ष बनाया, जबकि इमरान मसूद को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया. यानी जिसे अध्यक्ष बनाना था, उसे कार्यकारी अध्यक्ष बनाया; जिसे उपाध्यक्ष बनाना था, उसे अध्यक्ष बनाया; और जिसने संगठन में जान फूंकी, उसे हटा दिया. ऐसा क्यों, क्या गेम है?
यूपी में योगी के रहते विपक्ष और कांग्रेस के सामने ध्रुवीकरण का खतरा है. ऐसे में पहले से ही मुस्लिमों की पार्टी का टैग जैसे आरोपों का सामना कर रही कांग्रेस पर यह आरोप फैक्ट की तरह चस्पा हो जाता. इसलिए कांग्रेस सीधे इमरान मसूद को प्रदेश अध्यक्ष बना नहीं सकती थी, उपाध्यक्ष बनाया नहीं, क्योंकि अजय राय के नीचे मसूद काम करना नहीं चाहते थे.
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अजय राय को हटाना क्यों जरूरी हो गया था, मसूद की तैनाती के लिए?
अजय राय अगर अध्यक्ष रहते तो मसूद की कार्यकारी अध्यक्ष और डिप्टी के नाते सुनते नहीं. इसलिए कांग्रेस की ओर से एक नई व्यवस्था बनाई गई. क्या कभी सुना है कि फुलटाइम अध्यक्ष के साथ एक कार्यकारी अध्यक्ष हो? इसका क्या मतलब है? यानी आराधना मिश्रा बस फेस हैं, अध्यक्ष इमरान मसूद को ही बनाया गया है. ताकि अध्यक्ष कहने को आराधना रहें, लेकिन फैसले मसूद ही लें. इसके पीछे की कोशिश यह है कि ध्रुवीकरण से कैसे बचा जाए.
आराधना मिश्रा (एक ब्राह्मण चेहरा) को अध्यक्ष बनाकर एक 'सॉफ्ट और सेफ' संदेश दिया गया है, लेकिन 'वर्किंग प्रेसिडेंट' का पद बनाकर यूपी में कांग्रेस की असल चाबियां इमरान मसूद को सौंप दी गई हैं. राजनीति में फुलटाइम अध्यक्ष के साथ एक मजबूत कार्यकारी अध्यक्ष का मतलब यही निकाला जा रहा है कि आराधना मिश्रा केवल 'चेहरा' हैं, जबकि फैसले लेने वाली 'ताकत' इमरान मसूद होंगे. इससे ध्रुवीकरण का खतरा भी टलेगा और मसूद को फ्री-हैंड भी मिलेगा.
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मुस्लिम वोट बैंक पर अधिकार की लड़ाई और 'ओवैसी फैक्टर'
कांग्रेस के इस फैसले का दूसरा सबसे बड़ा पहलू 'मुस्लिम वोट' है. नेशनल लेवल पर तो कांग्रेस को मुस्लिमों का थोक में वोट मिलता है, लेकिन यूपी में जहां क्षेत्रीय पार्टी बड़ी है, वहां यही वोट सपा और बंगाल में TMC जैसी पार्टियों को जाता है. ऐसे में कांग्रेस की कोशिश है कि यूपी में भी मुस्लिम वोट को फिर से अपनी ओर खींचा जाए, जो कभी उसका हुआ करता था, लेकिन कांग्रेस के कमजोर होते ही सपा और बसपा की ओर शिफ्ट हो गया. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मुस्लिमों का अच्छा समर्थन मिला है, जिससे कांग्रेस को कॉन्फिडेंस मिला है. उसे लगता है कि वो अपने इस वोट को वापस पा सकती है और इसे स्टेबल करके सपा पर ज्यादा से ज्यादा सीटों के लिए दबाव बना सकती है.
यहां तक तो सब ठीक है, लेकिन कांग्रेस की राह में सबसे बड़ा रोड़ा असदुद्दीन ओवैसी यानी AIMIM का बढ़ता प्रभाव है. ओवैसी जब भी यूपी में आक्रामक चुनाव लड़ते हैं, कांग्रेस और सपा का मुस्लिम वोट कटता है. इसी संदर्भ में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का इमरान मसूद को दिया गया वह 'बिरयानी' वाला चर्चित बयान याद किया जा रहा है.
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खड़गे का हैदराबादी बिरयानी वाला बयान याद है ना?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का एक बयान वायरल हुआ था, जब वो संसद परिसर में अपनी ही पार्टी के सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद से बात करने के दौरान यह कहते नजर आए थे कि ‘हैदराबादी परेशानी को उत्तर प्रदेश में घुसने मत देना, वरना वो खुद भी डूबेगी और हमें भी डुबो देगी.’ इस वीडियो के वायरल होने के बाद कहा गया कि यह कोई आम बयान नहीं है, बल्कि कांग्रेस के अंदरखाने पैदा हुए डर की ओर इशारा कर रहा है. हालांकि, यहां यह भी बता देना जरूरी है कि खड़गे ने अपने इस वीडियो में किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन सियासी मामलों के जानकार और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे सीधे-सीधे असदुद्दीन ओवैसी से जोड़ दिया.
इस वीडियो में कांग्रेस अध्यक्ष ने इमरान मसूद से कहा कि, ‘हैदराबादी समस्या को यूपी में मत घुसने दो. वो खुद बर्बाद हो जाएगा और हमें भी बर्बाद कर के जाएगा. तुम जानते हो हैदराबाद शहर तीन चीजों के लिए मशहूर है- एक शेरवानी, दूसरी बिरयानी और तीसरी परेशानी.’
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कुल मिलाकर खड़गे ने मसूद को स्पष्ट कर दिया था कि 'हैदराबादी बिरयानी' खाने के लिए अच्छी है, यूपी के मुसलमानों के लिए ठीक नहीं. यानी ओवैसी के कारण यूपी का मुस्लिम वोट नहीं बंटना चाहिए. ओवैसी के प्रभाव को हर हाल में रोकना है और यह काम यूपी में इमरान मसूद से बेहतर कोई नहीं कर सकता. मसूद की जिम्मेदारी है कि वह मुसलमानों के बीच यह संदेश लेकर जाएं कि बीजेपी से सीधा मुकाबला केवल कांग्रेस (और इंडिया गठबंधन) कर सकती है, ओवैसी नहीं.
सपा पर दबाव की रणनीति और मुस्लिम वोट बने 'बार्गेनिंग चिप'?
कांग्रेस की इमरान मसूद वाली रणनीति केवल बीजेपी या ओवैसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि अपने सहयोगी दल 'समाजवादी पार्टी' के लिए भी एक संदेश है. अखिलेश यादव फिलहाल यूपी में विपक्ष के 'बड़े भाई' की भूमिका में हैं और मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण पर उनका भरोसा है. लेकिन, अगर इमरान मसूद के नेतृत्व में मुस्लिम वोटर कांग्रेस की तरफ झुकना शुरू करता है, तो कांग्रेस की ताकत में इजाफा होगा. आगामी विधानसभा चुनावों में जब सीटों के बंटवारे की बात आएगी, तब कांग्रेस इस 'मुस्लिम जनाधार' का इस्तेमाल समाजवादी पार्टी से ज्यादा सीटें ऐंठने के लिए एक 'बार्गेनिंग चिप' के रूप में करेगी. मसूद लगातार अपने बल पर चुनाव लड़ने और 200 सीटों का दावा कर रहे हैं.
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जमीन पर सपा और कांग्रेस के बीच मुस्लिम वोट के नेतृत्व को लेकर जबरदस्त लड़ाई!
कांग्रेस और सपा में भले गठबंधन है. दोनों के सामने बीजेपी है, लेकिन दोनों की बनती नहीं है. इसलिए कांग्रेस और सपा के मुस्लिम नेताओं की लड़ाई नीचे तक पहुंच गई है. बीते दिनों सहारनपुर में जिला लेवल पर हुई एक बैठक में क्रेडिट की लड़ाई और पुराने द्वंद्व को लेकर सपा विधायक आशु मलिक और स्थानीय सांसद इमरान मसूद के बीच नोंकझोंक हुई थी. आजम खान के रूप में सपा के पास एक बड़ा मुसलमान चेहरा हुआ करता था, लेकिन आजम के सीन से हटते ही मुस्लिमों के नेतृत्व की कमान इमरान मसूद और कांग्रेस लेने की कोशिश कर रही है.
1. इमरान मसूद के जरिए 20% मुस्लिम वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर
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इमरान मसूद की कांग्रेस को जरूरत क्यों है, इसका जवाब 2024 के लोकसभा चुनाव में छिपा है!
यूपी में लगभग 19-20% मुस्लिम आबादी है, जो राज्य की 403 में से करीब 100-110 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव डालती है.
2024 के लोकसभा चुनाव में इमरान मसूद ने सहारनपुर सीट से 64,542 वोटों के मार्जिन से जीत दर्ज की. उन्होंने मुस्लिम-दलित समीकरण को साधते हुए 5.47 लाख से ज्यादा वोट हासिल किए.
कांग्रेस को एक ऐसा 'मास मुस्लिम लीडर' चाहिए जो अपना चुनाव तो जीत ही सके, बल्कि इस 20% वोट बैंक को भी प्रभावित कर सके. हालांकि, उन्हें फुलटाइम अध्यक्ष न बनाने के पीछे भाजपा का 2022 का 41.29% वोट शेयर है, जो ध्रुवीकरण होने पर और मजबूत हो सकता था.
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2. आराधना मिश्रा के जरिए सवर्णों को संदेश!
अजय राय (भूमिहार) को हटाकर आराधना मिश्रा (ब्राह्मण) को अध्यक्ष बनाने के पीछे यूपी का जातीय गणित काम कर रहा है:
यूपी में ब्राह्मण मतदाता लगभग 9-10% हैं.
जब 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था और पार्टी का वोट शेयर गिरकर महज 2.33% रह गया था, तब पूरे राज्य में कांग्रेस सिर्फ 2 सीटें जीत पाई थी. उन दो में से एक सीट (रामपुर खास) आराधना मिश्रा की थी. वह लगातार तीन बार (2014 उपचुनाव, 2017, 2022) की विधायक हैं.
आराधना मिश्रा के चेहरे के जरिए कांग्रेस ने ब्राह्मण/सवर्ण वोटर्स और सॉफ्ट-हिंदुत्व का दरवाजा खुला रखा है, ताकि ध्रुवीकरण को काउंटर किया जा सके और इमरान मसूद को बैकग्राउंड से पूरी मशीनरी चलाने का 'फ्री-हैंड' मिल सके.
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3. ओवैसी फैक्टर (AIMIM) का डैमेज कंट्रोल
मल्लिकार्जुन खड़गे के 'हैदराबादी बिरयानी' वाले बयान का मकसद उसी वोट कटवा वाले फैक्टर से निपटना है.
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2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी (AIMIM) को राज्य में मात्र 0.49% (करीब 4.5 लाख) वोट मिले थे.
भले ही ओवैसी को वोट कम मिले हों, लेकिन इम्पैक्ट कांग्रेस के लिए बड़ा था. कम से कम 12-15 सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर 2,000 से 10,000 वोटों के बीच था और AIMIM के उम्मीदवारों ने वहां इतने ही मुस्लिम वोट काटे, जिसका सीधा फायदा भाजपा को और नुकसान सपा-गठबंधन को हुआ.
खड़गे का संदेश साफ है—इमरान मसूद की जिम्मेदारी इस 0.49% और उससे अधिक भटकने वाले मुस्लिम वोट को ओवैसी के पास जाने से रोकना और कांग्रेस के पक्ष में 100% ट्रांसफर कराना है.
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4. समाजवादी पार्टी (SP) के साथ 2027 की 'बार्गेनिंग'!
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 32.06% वोट शेयर के साथ 111 सीटें जीती थीं, जिसमें मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण का सबसे बड़ा हाथ था.
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लोकसभा 2024 का टर्नअराउंड: सपा के साथ गठबंधन में लड़ते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर यूपी में (17 सीटों पर लड़कर) 9.46% तक पहुंच गया और पार्टी ने 6 सीटें जीतीं.
अखिलेश यादव का मानना है कि मुस्लिम वोटर पूरी तरह सपा के पास है. कांग्रेस इमरान मसूद के जरिए इस 20% वोट बैंक में अपनी सीधी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है. अगर मसूद यह कर पाते हैं, तो 2027 में जब 403 सीटों का बंटवारा होगा, तो कांग्रेस सपा से महज 20-30 सीटें नहीं, बल्कि 80-100 सीटों की डिमांड करने की स्थिति में होगी.
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ऐसे में देखा जाए तो आराधना मिश्रा को आगे रखकर सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने की कोशिश, इमरान मसूद के जरिए मुसलमानों की गोलबंदी, ओवैसी को रोकना और सपा पर दबाव बनाना—कांग्रेस का यह यूपी मॉडल कागज पर एक 'परफेक्ट गेम' नजर आता है. हालांकि, यूपी की जटिल राजनीति में यह प्रयोग कितना सफल होगा और ध्रुवीकरण की आंधी से कांग्रेस का यह 'कवर फायर' कितना बच पाएगा, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा.