जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

कसारी-मसारीः अपराध के मलबे पर सुशासन के मंत्र

कसारी-मसारी से कृष्णपुरी तक का यह सफर केवल पते का बदलाव नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश में ध्वस्त हो चुके माफियाराज के मलबे पर सुशासन, सुरक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ऐसा शिलान्यास है, जो आने वाले दशकों तक याद किया जाएगा.

Author
17 Oct 2026
( Updated: 17 Oct 2026
08:04 PM )
कसारी-मसारीः अपराध के मलबे पर सुशासन के मंत्र
Image Source- NMF Input
Advertisement

किसी भी स्थान का नाम केवल कुछ अक्षरों का निर्जीव समूह नहीं होता, बल्कि वह उस क्षेत्र की अस्मिता, उसके इतिहास, उसकी सांस्कृतिक चेतना और वहां के निवासियों के सामूहिक मनोविज्ञान का जीवंत परिचायक होता है. जब किसी स्थान के नाम के साथ किसी कालखंड का खौफ, आतंक और अपराध जुड़ जाता है, तो वह नाम ही अपने आप में एक अभिशाप बन जाता है.
 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रयागराज के कसारी-मसारी इलाके का नाम बदलकर 'कृष्णपुरी' करने की हालिया घोषणा को एक सामान्य प्रशासनिक नजरिए से देखना उचित नहीं होगा. यह घोषणा उस लंबे और भयावह अध्याय का अंत है, जिसमें सत्ता के संरक्षण में पनपे माफियाओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था को अपनी जागीर समझ लिया था.

प्रयागराज का कसारी-मसारी इलाका दशकों तक एक खास तरह के आतंक का पर्याय रहा है. यह वह क्षेत्र था जहां से गुजरते हुए आम नागरिक सिहर उठते थे और जहां पुलिस प्रशासन भी कदम रखने से पहले कई बार सोचता था. यह इलाका अतीक अहमद जैसे कुख्यात माफिया के खौफ का गवाह रहा है. जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कसारी-मसारी का नाम 'कृष्णपुरी' करने की घोषणा की और वहां अतीक की कब्जाई जमीन पर गरीबों के फ्लैट बनाने के लिए भूमिपूजन किया, तो उन्होंने एक साथ कई संदेश दिए। भारतीय दर्शन और मिथकों में भगवान कृष्ण को हमेशा अन्याय, अत्याचार और आसुरी शक्तियों (कंस) के विनाशक के रूप में देखा गया है. कसारी-मसारी जैसे आतंक के गढ़ को 'कृष्णपुरी' का नाम देना प्रतीकात्मक रूप से यह स्थापित करता है कि आधुनिक युग के इन 'कंसों' का अंत हो चुका है और अब यहां धर्म, न्याय और कानून का शासन होगा. यह उस क्षेत्र के लोगों को उनके ही घर में सदियों पुराने खौफ से मनोवैज्ञानिक रूप से मुक्त करने की एक अभिनव पहल है. 

इस नैरेटिव को समझने के लिए हमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के काम करने के तरीके और उनकी ओर से गढ़े जा रहे 'सुशासन के नए व्याकरण' को गहराई से देखना होगा. यह व्याकरण केवल अपराधियों को जेल भेजने या उनके अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाने तक सीमित नहीं है. योगी आदित्यनाथ ने न्याय और सुशासन का एक ऐसा 'मॉडल' पेश किया है, जो शायद स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अपने आप में अनूठा है. इसका जीवंत उदाहरण प्रयागराज का ही लूकरगंज इलाका है. एक समय था जब लूकरगंज में माफिया अतीक अहमद का एक ऐसा अवैध साम्राज्य और कब्जा था, जिसकी तरफ आंख उठाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता था. योगी सरकार में उसी जमीन पर माफिया का कब्जा ढहाकर वहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों के लिए शानदार फ्लैट बनाए गए और खुद मुख्यमंत्री ने उन फ्लैटों की चाबियां लाभार्थियों को सौंपी हैं. ठीक इसी तर्ज पर राजधानी लखनऊ में भी एक बड़ा संदेश दिया गया. माफिया मुख्तार अंसारी, जिसका नाम सुनकर कभी सत्ता के गलियारों में सन्नाटा खिंच जाता था, उसकी अवैध रूप से कब्जाई गई करोड़ों की जमीन को लखनऊ में खाली कराया गया और वहां भी गरीबों और दलितों के लिए आवास बनाए जा रहे हैं. 

Advertisement

लूकरगंज में अतीक की जमीन पर गरीबों का घर, लखनऊ में मुख्तार की जमीन पर गरीबों के फ्लैट और अब कसारी-मसारी में भूमिपूजन और उसका नामकरण 'कृष्णपुरी' करना, ये तीनों घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही सुविचारित प्रशासनिक रणनीति के अहम हिस्से हैं. इसके निहितार्थ बहुत गहरे और व्यापक हैं. पहला निहितार्थ यह है कि सरकार यह संदेश दे रही है कि वह अपराधियों से सिर्फ जमीन छीन नहीं रही है, बल्कि उस संपत्ति को समाज के सबसे निचले और वंचित तबके को वापस लौटा रही है, जिसका वास्तव में उस पर हक है. 

दूसरा बड़ा निहितार्थ यह है कि माफिया चाहते हैं कि समाज उन्हें कानून से ऊपर समझे. जब सरकार उनके अवैध साम्राज्यों को मिट्टी में मिलाकर वहां गरीबों को बसाती है, तो वह माफिया के 'इकबाल' को हमेशा के लिए दफन कर देती है. आने वाली पीढ़ियां जब लूकरगंज या लखनऊ के इन फ्लैटों को देखेंगी, तो उन्हें किसी माफिया का खौफ याद नहीं आएगा, बल्कि उन्हें यह याद रहेगा कि एक सरकार आई थी जिसने कानून का राज स्थापित किया था. 

यह पहली बार नहीं है जब योगी आदित्यनाथ ने नामों के जरिए सांस्कृतिक और राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है. उनका यह सफर बहुत पुराना और स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ा हुआ है. इलाहाबाद को प्रयागराज करना, फैजाबाद को अयोध्या करना, या मुगलसराय स्टेशन का नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखना, ये सभी कदम उत्तर प्रदेश को उसकी मूल सांस्कृतिक पहचान वापस लौटाने और औपनिवेशिक और आक्रांताओं की गुलामी के प्रतीकों को मिटाने के प्रयास रहे हैं. लेकिन कसारी-मसारी का कृष्णपुरी होना इन सबसे एक कदम आगे की बात है. पिछले नामकरण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सुधार थे, जबकि यह नामकरण एक 'समकालीन सामाजिक मुक्ति' का प्रतीक है. यह सिर्फ इतिहास को सुधारना नहीं है, बल्कि वर्तमान को खौफ से आज़ाद कर भविष्य को सुरक्षित करना है. 

राजनीति में परसेप्शन का बहुत बड़ा महत्व होता है. एक दौर था जब उत्तर प्रदेश की पहचान देश और दुनिया में एक बीमारू राज्य और अपराध के अभयारण्य के रूप में होती थी. फिल्मों से लेकर साहित्य तक में यूपी को माफियाओं, बाहुबलियों और कट्टों के प्रदेश के रूप में चित्रित किया जाता था. निवेशकों ने इस राज्य से मुंह मोड़ लिया था और आम युवा पलायन को मजबूर था. ऐसे में जब राज्य का मुखिया खुद मोर्चे पर खड़ा होकर यह संदेश देता है कि अपराधियों के लिए इस प्रदेश में कोई जगह नहीं है, तो उसका असर समाज के हर तबके पर पड़ता है. अतीक और मुख्तार जैसे माफिया केवल व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था के प्रतीक थे, जिसने राजनीति, पुलिस और प्रशासन को अपने आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. इन प्रतीकों का ध्वस्त होना और उनकी जगह 'कृष्णपुरी' जैसे आस्था और विकास के प्रतीकों का उभरना यह साबित करता है कि राज्य में अब एक नई कार्यसंस्कृति ने जन्म लिया है, जिसमें तुष्टीकरण या बाहुबल के लिए कोई स्थान नहीं है. 

लेखक- हरि शंकर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार

Advertisement

यह भी पढ़ें

यह भी पढ़ें- केरल की अरुंधति का कन्यादान करेंगे CM योगी! एक Video ने बदली थी जिंदगी, लेटर लिखकर मुख्यमंत्री ‘भाई’ से की भावुक अपील

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें