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'पत्नी नौकरानी नहीं, जीवन साथी है...', सुप्रीम कोर्ट ने तलाक मांग रहे पति को लगाई कड़ी फटकार, जानें पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच विवाद के मामले में अहम टिप्पणी की. पति ने पत्नी पर खाना न बनाने को ‘मानसिक क्रूरता’ बताते हुए तलाक मांगा, लेकिन कोर्ट ने इसे मानने से इनकार कर दिया और मामले ने नई बहस छेड़ दी.

'पत्नी नौकरानी नहीं, जीवन साथी है...', सुप्रीम कोर्ट ने तलाक मांग रहे पति को लगाई कड़ी फटकार, जानें पूरा मामला
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देश की अदलतों में पति-पत्नी के बीच घेरलू विवाद, लड़ाई, हिंसा जैसे तमाम केस आते हैं. इस पर न्यायलाय द्वारा दोनों पक्षों को सुनकर उचित फैसला भी सुनाया जाता हैं. लेकिन कई मामलों से न्यायलाय द्वारा ऐसी टिप्पणी कर दी जाती है जो आज के समाज में बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पति-पत्नी के रिश्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है. एक पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ ‘मानसिक क्रूरता’ का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की. उसका कहना था कि पत्नी खाना नहीं बनाती और घरेलू कामों में रुचि नहीं लेती. लेकिन मामला जैसे ही अदालत पहुंचा, इस पर न्यायाधीशों का नजरिया बिल्कुल अलग देखने को मिला.

घरेलू कामों को नहीं माना जा सकता क्रूरता

सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कर दिया कि अगर पत्नी खाना नहीं बनाती या घर के काम ठीक से नहीं कर पाती, तो इसे मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि ऐसे कारणों के आधार पर तलाक की मांग करना उचित नहीं है. इस टिप्पणी ने समाज में लंबे समय से चले आ रहे एकतरफा सोच को सीधे चुनौती दी है.

बदलते वक्त के साथ सोच बदलने की जरूरत

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मामलें की सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने बेहद ही साफ शब्दों में कहा कि समय बदल चुका है और अब पति को भी घर के कामों में बराबरी से हिस्सा लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि खाना बनाना, सफाई करना या कपड़े धोना सिर्फ पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह दोनों की साझा जिम्मेदारी है. सुनवाई के दौरान कोर्ट की यह टिप्पणी सबसे ज्यादा चर्चा में रही कि 'आपने किसी नौकरानी से नहीं बल्कि जीवन साथी से शादी की है.' यह वाक्य सिर्फ एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक मजबूत संदेश भी है. अदालत ने यह भी कहा कि पति को अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए और पत्नी के साथ मिलकर घर संभालना चाहिए.

शादीशुदा जिंदगी में सहयोग ही असली रिश्ते का आधार

इस मामले में यह सामने आया कि दोनों की शादी साल 2017 में हुई थी और 2019 से वे अलग रह रहे हैं. कोर्ट से लेकर तमाम स्तर पर मध्यस्थता की कोशिश भी सफल नहीं हो पाई. पति ने निचली अदालत से तलाक हासिल कर लिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उसी फैसले को सही ठहराया है. अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा है. अगली सुनवाई 27 अप्रैल को तय की गई है. कोर्ट का कहना है कि वह दोनों पक्षों से सीधे बातचीत कर मामले को बेहतर तरीके से समझना चाहता है.

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बताते चलें कि इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि शादी सिर्फ जिम्मेदारियों का बंटवारा नहीं, बल्कि साझेदारी का नाम है. आज के दौर में जब महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं, तो घर के कामों में भी बराबरी जरूरी है. यह फैसला सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की सोच बदलने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.

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