किताबों की दुकान से 3000 करोड़ के नेटवर्थ तक का सफर, जानें कौन हैं चीनी रोबोट डॉग विवाद में घिरे गलगोटिया यूनिवर्सिटी के मालिक?

दिल्ली एनसीआर की चर्चित गलगोटिया यूनिवर्सिटी इस समय विवादों में है. दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इंडिया एआई इंपैक्ट समिट 2026 में यूनिवर्सिटी पर चीन में बने ‘रोबोटिक डॉग’ को भारतीय तकनीक बताकर पेश करने का आरोप लगा है.

Social Media

दिल्ली एनसीआर में उच्च शिक्षा की बात हो और गलगोटिया यूनिवर्सिटी (Galgotias University) का नाम न आए, ऐसा कम ही होता है. आमतौर पर यह विश्वविद्यालय अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों, प्लेसमेंट रिकॉर्ड और आधुनिक कैंपस सुविधाओं को लेकर सुर्खियों में रहता है. लेकिन इस बार मामला अलग है. राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इंडिया एआई इंपैक्ट समिट 2026 (India AI Impact Summit)  के दौरान यूनिवर्सिटी पर गंभीर आरोप लगे हैं, जिनकी गूंज देश से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर  तक सुनाई दे रही है. आइए जानते हैं, गलगोटिया विश्वविद्यालय की शुरुआत करने वाले सुनील गलगोटिया कौन है?

दरअसल, यूनिवर्सिटी पर आरोप है कि समिट में प्रदर्शित किया गया एक ‘रोबोटिक डॉग’ (Robotic Dog) भारतीय तकनीक बताकर पेश किया गया, जबकि तकनीकी विशेषज्ञों ने दावा किया कि यह डिवाइस चीन में निर्मित है. कई टेक एक्सपर्ट्स और सोशल मीडिया यूजर्स ने कहा कि यह मॉडल चीन की कंपनी Unitree Robotics का है. बताया जा रहा है कि ऐसा रोबोट ऑनलाइन मार्केट में लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये के बीच उपलब्ध है. कुछ डिजिटल हैंडल्स ने पुराने वीडियो और तस्वीरें साझा करते हुए यह दावा किया कि यही मॉडल पहले चीन में प्रदर्शित किया जा चुका है.

यूनिवर्सिटी को समिट करने पर दिया गया निर्देश 

मामला सामने आते ही विवाद बढ़ गया. सूत्रों के अनुसार, सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए यूनिवर्सिटी को समिट से बाहर कर दिया. इस कदम को देश की साख से जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि एआई जैसे संवेदनशील और उभरते क्षेत्र में पारदर्शिता बेहद जरूरी मानी जाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, ऐसे में किसी भी तरह की गलत प्रस्तुति से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल खड़े हो सकते हैं. हालांकि यूनिवर्सिटी की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बार फिर शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है. क्या प्रतिष्ठा की दौड़ में तथ्यों से समझौता किया जा सकता है? यह सवाल अब शिक्षा जगत के सामने खड़ा है.

सुनील गलगोटिया का सफर

जिस संस्थान को लेकर आज चर्चा हो रही है, उसकी नींव सुनील गलगोटिया ने रखी थी. वर्ष 2011 में स्थापित यह विश्वविद्यालय ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे के पास स्थित है. यहां ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और पीएचडी तक के कोर्स संचालित होते हैं. वर्तमान में इसकी कमान ध्रुव गलगोटिया के हाथों में है, जो सीईओ की भूमिका निभा रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनील गलगोटिया साल 1930 में दिल्ली के कनॉट प्लेस में ‘ईडी गलगोटिया एंड संस’ नाम से परिवार की किताबों की दुकान थी. बाद में सुनील गलगोटिया ने व्यवसाय की जिम्मेदारी संभाली और इसे नई दिशा दी. उन्होंने दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से पढ़ाई पूरी की.

पब्लिशिंग क्षेत्र में रखा कदम 

1980 के दशक में उन्होंने पब्लिशिंग क्षेत्र में कदम रखा और गलगोटियास पब्लिकेशंस की शुरुआत की. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों के डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स हासिल किए. धीरे-धीरे उनका व्यवसाय बढ़ता गया. साल 2000 में उन्होंने गलगोटिया इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी की स्थापना की. इसी वर्ष गलगोटिया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की भी शुरुआत हुई. वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे यूनिवर्सिटी का दर्जा प्रदान किया. 

कितनी है नेटवर्थ?

आज इस समूह के अंतर्गत 40,000 से अधिक छात्र अध्ययन कर रहे हैं और 40 से ज्यादा देशों के विद्यार्थी यहां उच्च शिक्षा प्राप्त करने आते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिस सफर की शुरुआत एक छोटे से बुक स्टोर से हुई थी, वह आज लगभग 3000 करोड़ रुपये के कारोबार में बदल चुका है.सुनील गलगोटिया की शुरुआत बेहद साधारण रही. बताया जाता है कि पहली किताब प्रकाशित करने के लिए उन्हें करीब 9,000 रुपये उधार लेने पड़े थे. साल 2000 में जब उन्होंने संस्थान की शुरुआत की, तब केवल 40 छात्र थे. आज उनकी नेटवर्थ हजारों करोड़ रुपये आंकी जाती है.

बताते चलें कि वर्तमान विवाद ने एक बार फिर यह दिखाया है कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद भी पारदर्शिता और विश्वसनीयता सबसे अहम होती है. एआई जैसे क्षेत्र में जहां नवाचार और भरोसा साथ-साथ चलते हैं, वहां किसी भी तरह की चूक बड़ी कीमत दिला सकती है. अब सबकी नजर इस बात पर है कि यूनिवर्सिटी इस विवाद पर क्या स्पष्टीकरण देती है और आगे किस तरह अपनी छवि को संभालती है.

Advertisement

यह भी पढ़ें

Advertisement

LIVE