ईरान-इजराइल जंग पर दो धड़ों में बंटी कांग्रेस, शशि थरूर-मनीष तिवारी ने किया मोदी सरकार का खुला समर्थन
मध्य पूर्व में चल रही जंग को लेकर भारत की आंतरिक राजनीति में हलचल देखने को मिल रही है. देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस एक तरफ एलपीजी से लेकर तमाम मुद्दों पर मोदी सरकार की आलोचना कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी के दो वरिष्ठ नेता शशि थरूर और मनीष तिवारी केंद्र सरकार द्वारा लिए गए फ़ैसलों को सराहना कर रहे हैं.
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मिडिल ईस्ट में चल रही जंग ने एक तरफ वैश्विक चिंता को बढ़ा दिया है. क्योंकि इस युद्ध का अब सीधा असर धीरे-धीरे अब आम लोगों तक पहुंचने लगा है. इस बीच भारत की आंतरिक राजनीति में भी युद्ध को लेकर हलचल तेज हो गई है. जहां कांग्रेस एक तरफ केंद्र सरकार की विदेश नीति को घेरने में जुटी है, वहीं पार्टी के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं.
दरअसल, कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता शशि थरूर और मनीष तिवारी ने इस मुद्दे पर पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाते हुए सरकार की रणनीति की सराहना की है. उनका मानना है कि मौजूदा हालात में भारत को बेहद सावधानी और संतुलन के साथ कदम उठाने की जरूरत है, जो केंद्र की मोदी सरकार कर रही है. जो आम जनता के हित में दिखाई दे रहा है.
मनीष तिवारी ने गिनाए राष्ट्रीय हित
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने साफ तौर पर कहा कि ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहा यह संघर्ष भारत का नहीं है. ऐसे में देश को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए. उन्होंने तेल, गैस, खाद की आपूर्ति और विदेशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को सबसे अहम बताया. मनीष तिवारी के मुताबिक, सरकार इस समय जिस तरह से सोच-समझकर फैसले ले रही है, वह आम जनता के हित में है. उन्होंने यह भी कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता का असली मतलब यही है कि देश अपने हितों की रक्षा करते हुए जटिल परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखे.
शशि थरूर ने संयम को बताया सबसे बड़ी ताकत
मनीष तिवारी के अलावा केरल से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी सरकार के रुख को सही ठहराया. उन्होंने कहा कि भारत की चुप्पी को कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि यह एक परिपक्व और समझदारी भरा कदम है. थरूर के अनुसार, हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर खुलकर बयान देना जरूरी नहीं होता. कई बार संयम ही सबसे बड़ी ताकत बन जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें किसी सरकार को सलाह देनी होती, तो वे भी संयम और संतुलन बनाए रखने की ही बात कहते. थरूर ने आगे कहा कि आज की जटिल वैश्विक स्थिति में सिद्धांतों और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है. अपने हितों की रक्षा करते हुए मूल्यों का सम्मान करना ही सही नीति होती है. उनके इस बयान को सरकार की विदेश नीति के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है.
कांग्रेस की आधिकारिक लाइन से टकराव
वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस की आधिकारिक लाइन सरकार की मौजूदा परिस्थिति में लगातार केंद्र की मोदी सरकार की आलोचना कर रही है. पार्टी लगातार यह आरोप लगा रही है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर स्पष्ट और मजबूत रुख नहीं अपना रही है. लेकिन थरूर और तिवारी के बयानों ने पार्टी के अंदरूनी मतभेद को उजागर कर दिया है. ऐसे में राजनीतिक जानकरों का मानना है कि इस तरह के बयानों से कांग्रेस की रणनीति कमजोर पड़ सकती है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब इन नेताओं ने पार्टी लाइन से हटकर अपनी राय रखी हो. इससे पहले भी दोनों नेता कई मुद्दों पर स्वतंत्र विचार रखते आए हैं.
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बहरहाल, ईरान-इजराइल तनाव के बीच भारत की विदेश नीति को लेकर जहां सियासत तेज है, वहीं कांग्रेस के भीतर उभरे मतभेद इस बहस को और दिलचस्प बना रहे हैं. अब देखना होगा कि पार्टी इस स्थिति को कैसे संभालती है और आगे क्या रुख अपनाती है.
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