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तेल और गैस के बाद अब इंटरनेट के लिए मचेगा हाहाकार? होमुर्ज से ईरान काट देगा दुनिया का नेटवर्क! भारत पर कैसे होगा असर

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज चर्चा में है, जहां से तेल-गैस के साथ अहम इंटरनेट केबल्स भी गुजरती हैं. ईरान के संभावित कदमों से इन केबल्स पर खतरा बढ़ा है. अगर इन्हें नुकसान पहुंचा, तो वैश्विक इंटरनेट और भारत की डिजिटल सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं.

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मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच सबसे ज्यादा चर्चा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की हो रही है. दरअसल, यही वह अहम समुद्री रास्ता है जिसके जरिए दुनिया के कई बड़े देशों तक तेल और गैस की सप्लाई पहुंचती है. ईरान द्वारा इस मार्ग से गुजरने वाली ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने की खबरों के बाद कई देश पहले ही संकट के दौर में हैं. लेकिन इसी रास्ते से एक और बेहद अहम चीज गुजरती है, जिस पर अब खतरा मंडराने लगा है. यह हैं समुद्र की करीब 200 फीट गहराई में बिछी पतली-सी फाइबर ऑप्टिक केबल्स. यही वे अदृश्य धागे हैं, जिन पर पूरी दुनिया का इंटरनेट टिका हुआ है. वीडियो कॉल से लेकर बैंकिंग ट्रांजैक्शन तक, हर सेकंड का डेटा इन्हीं केबल्स के जरिए गुजरता है.

ऐसे में अब यही डिजिटल लाइफलाइन खतरे में बताई जा रही है. आशंका है कि अगर ईरान इन केबल्स को प्रभावित करता है, तो वैश्विक स्तर पर इंटरनेट सेवाएं ठप पड़ सकती हैं. इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की डिजिटल व्यवस्था पर भी देखने को मिल सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक इस समय दो समुद्री रास्ते सबसे ज्यादा संवेदनशील माने जा रहे हैं. पहला स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और दूसरा बाब अल-मंडेब स्ट्रेट, जो रेड सी में स्थित है. इन दोनों मार्गों के नीचे फाइबर ऑप्टिक केबल्स का विशाल नेटवर्क फैला हुआ है, जो वैश्विक इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए बेहद अहम है. दावा किया जा रहा है कि हॉर्मुज क्षेत्र में समुद्र के भीतर खतरनाक बाधाएं या सुरंगें बनाई गई हैं, जिससे जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है. वहीं, लाल सागर में हूथी समूह, जिन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त बताया जाता है, लगातार जहाजों को निशाना बना रहे हैं। खास बात यह है कि ये दोनों ही इलाके उन संवेदनशील स्थानों के ऊपर स्थित हैं, जहां समुद्र के नीचे इंटरनेट केबल्स बिछी हुई हैं, जिससे खतरा और बढ़ गया है.

बैंकिंग सेवा पर बड़ा खतरा 

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समुद्र के नीचे बिछी ये फाइबर ऑप्टिक केबलें हजारों किलोमीटर तक फैली होती हैं और वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा इन्हीं के जरिए संचालित होता है. वीडियो कॉल, ईमेल, बैंकिंग ट्रांजैक्शन से लेकर AI आधारित सेवाएं पूरी तरह इन नेटवर्क पर निर्भर हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के सबसे संकरे हिस्से में पानी की गहराई महज करीब 200 फीट है, जिससे इन केबल्स को नुकसान पहुंचने का जोखिम बढ़ जाता है. जानकारी के मुताबिक रेड सी और हॉर्मुज क्षेत्र में करीब 20 प्रमुख अंडरसी केबलें मौजूद हैं. इनमें से 17 केबलें लाल सागर के रास्ते गुजरते हुए यूरोप, एशिया और अफ्रीका को आपस में जोड़ती हैं. वहीं हॉर्मुज मार्ग से AEAE-1, फाल्कन, गल्फ ब्रिज इंटरनेशनल और टाटा TGN गल्फ जैसी महत्वपूर्ण केबलें गुजरती हैं, जो भारत की अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं.

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बताते चलें कि आज के दौर में ये अंडरसी केबलें वैश्विक कनेक्टिविटी की रीढ़ बन चुकी हैं. इंटरनेट की पूरी व्यवस्था इन्हीं पर निर्भर है, जिससे दुनिया का हर कोना डिजिटल रूप से जुड़ा रहता है. अमेज़ॅन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियों ने संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में बड़े डेटा सेंटर स्थापित किए हैं, जो इन समुद्री केबलों से ही जुड़े हुए हैं. दरअसल, पूरी डिजिटल दुनिया की नींव इन्हीं केबल्स पर टिकी है. ऐसे में यदि इन पर किसी तरह का हमला होता है, तो असर सिर्फ इंटरनेट सेवाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है.

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