जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

UP में डीबीटी से साकार होता अंत्योदय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय की अवधारणा में व्यवस्था की सफलता को इस कसौटी पर परखने की बात कही थी कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक कितनी निष्ठा से योजनाओं का लाभ पहुंचा. इस कसौटी पर उत्तर प्रदेश में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी का विस्तार साधारण सुधार से कहीं आगे की चीज़ दिखता है.

Author
10 Oct 2026
( Updated: 10 Oct 2026
08:13 PM )
UP में डीबीटी से साकार होता अंत्योदय
Image Source- NMF Input
Advertisement

अंत्योदय का अर्थ केवल इतना नहीं कि सरकारी मदद अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे. असली कसौटी यह है कि वह गरिमा के साथ पहुंचे. वर्षों तक गांव की बुजुर्ग महिला पेंशन के लिए दफ़्तर के चक्कर काटती रही, किसान अपने हक़ के लिए बाबुओं के आगे खड़ा रहा, और ग़रीब को हर पड़ाव पर किसी की सिफ़ारिश ढूंढ़नी पड़ी. मदद मिली भी तो अहसान की शक्ल में, उत्तर प्रदेश में डीबीटी ने यही तस्वीर बदली है. 

अब लखनऊ या दिल्ली से चला पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में उतरता है, न बीच में कोई दलाल, न कोई कटौती, हाथ फैलाने की जगह अब हक़ से हाथ बढ़ता है. सहायता भीख नहीं, अधिकार है और योगी सरकार ने दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय को इसी रूप में जमीन पर वास्तविकता में उतारा है. 

एक दशक पहले तक उत्तर प्रदेश की विडंबना यह रही है कि योजनाओं का पैसा राजधानी से तो चलता था लेकिन रास्ते में ही कहीं खो जाता था. फाइलें चलती थीं, हस्ताक्षर होते थे, घोषणाएं गूंजती थीं, और जिस व्यक्ति के नाम पर यह सारा आयोजन था, वह अक्सर उसी कतार के आख़िरी छोर पर खाली हाथ खड़ा रह जाता था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय की अवधारणा में व्यवस्था की सफलता को इस कसौटी पर परखने की बात कही थी कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक कितनी निष्ठा से योजनाओं का लाभ पहुंचा. इस कसौटी पर उत्तर प्रदेश में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी का विस्तार साधारण सुधार से कहीं आगे की चीज़ दिखता है. 

Advertisement

डीबीटी ने यह समीकरण बदल दिया है कि वंचित व्यक्ति याचक है और सरकार से उसे कुछ पाने के लिए किसी की सिफारिश या दलालों का सहारा चाहिए. जनधन खाते, आधार और मोबाइल की तिकड़ी पर खड़ी यह व्यवस्था सरकार और नागरिक के बीच की दूरी लगभग मिटा देती है. लखनऊ में एक बटन दबता है और सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी गांव में बैठी बुजुर्ग महिला के खाते में पैसा पहुंच जाता है. न कोई पर्ची, न कोई थैली, न कोई अहसान। जिस प्रदेश की आबादी कई देशों से बड़ी है, वहां इसका दायरा देखकर महत्व समझ आता है. केंद्र और राज्य की लगभग 200 योजनाएं इस ढांचे से जुड़ चुकी हैं. नौ करोड़ से अधिक लाभार्थी इसके दायरे में हैं और अब तक कई लाख करोड़ रुपये सीधे उनके खातों में पहुंचाए जा चुके हैं. इतने बड़े पैमाने पर यह काम तकनीक और इच्छाशक्ति के मेल से ही संभव हुआ. 

असली ताक़त आंकड़ों में कम, असर में अधिक दिखती है. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से यूपी में तीन करोड़ से अधिक किसान परिवारों को सीधी मदद मिल रही है. गन्ना किसानों का भुगतान और गेहूं-धान की एमएसपी खरीद का पैसा भी इसी रास्ते आता है, जिससे वह अनिश्चितता घटी है जो कभी किसान की नियति मान ली गई थी. एक करोड़ से अधिक बुजुर्ग, निराश्रित महिलाएं और दिव्यांगजन हर महीने अपनी पेंशन पाते हैं. कक्षा एक से आठ तक के बच्चों के अभिभावकों के खाते में 1200 रुपये प्रति छात्र भेजे जाते हैं, ताकि वे वर्दी, जूते-मोज़े, बस्ता और स्वेटर खरीद सकें. हर वर्ग के निर्धन विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति भी इसी रास्ते उन तक पहुंचती है. ये वही लोग हैं जिन्हें अंत्योदय में समाज की अंतिम पंक्ति कहा गया था. 

पारदर्शिता का सबसे ठोस सबूत वह पैसा है, जो अब बर्बाद नहीं होता. आधार से जुड़े सत्यापन ने लाखों फ़र्ज़ी और दोहरे नाम सूचियों से बाहर किए हैं. जो रकम पहले अपात्रों या कागज़ी खातों में चली जाती थी, वह अब असली हक़दारों के काम आ रही है. केवल 11 विभागों में दस हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की बचत का दावा इसी सफ़ाई का नतीजा है. बात सीधी है. ग़रीब के हिस्से की चोरी सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है. रास्ते में कटा हर रुपया उसी गरीब को चोट पहुंचाता है, जिसके पास खोने को सबसे कम है. 

इस बदलाव का एक पहलू ऐसा है जिसे आंकड़े पूरी तरह नहीं पकड़ पाते, और वह है सम्मान. किसी वृद्धा को पेंशन के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़े, किसी मज़दूर को अपनी सहायता के लिए नेताजी की परिक्रमा न करनी पड़े, तब सरकार और नागरिक का रिश्ता हक़ और जवाबदेही का बन जाता है. जिस नागरिक को भरोसा हो कि उसका हक़ बिना सिफ़ारिश उस तक पहुंचेगा, वह व्यवस्था को अपना मानने लगता है, यही भरोसा सुशासन की सबसे बड़ी पूंजी है.

डीबीटी का एक और असर गांव-गांव में बैंक की पहुंच के रूप में दिखा. जब योजनाओं का पैसा खाते में आना तय हुआ, तो खाता खुलवाना और उसे आधार से जोड़ना ज़रूरी हो गया. बैंक सखियां उन महिलाओं तक पहुंचीं जो कभी बैंक की दहलीज़ पार नहीं कर पाई थीं. आज उनके हाथ में अपना खाता और अपना एटीएम कार्ड है. यह सिर्फ़ तकनीकी उपलब्धि नहीं, सामाजिक बदलाव है. जिस महिला के नाम पर खाता है और जो उसे खुद चलाती है, उसकी बात घर में अलग वज़न रखती है. अपनी जेब पर अपना हक़ आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है और डीबीटी ने करोड़ों महिलाओं को उस सीढ़ी तक पहुंचाया है. 

Advertisement

यह बड़ी उपलब्धि है लेकिन चुनौतियों की बात भी की जानी चाहिए. तकनीक पर टिकी व्यवस्था उतनी ही मज़बूत होती है, जितनी उसकी सबसे कमज़ोर कड़ी. दूरदराज़ के इलाक़ों में नेटवर्क की कमी, बुजुर्गों के अंगूठे का मिलान न होना और डिजिटल जानकारी की कमी ऐसी बाधाएं हैं जिन पर और काम किया जाना चाहिए. अंत्योदय का तक़ाज़ा है कि जो सबसे कमज़ोर है, उसके लिए रास्ता सबसे आसान हो. शिकायत सुनने की व्यवस्था जितनी सुलभ और तेज़ होगी, भरोसा उतना ही गहरा होगा. 

यह भी पढ़ें- उपेक्षा से उत्कर्ष तक: पूर्वांचल का कायाकल्प और भदोही कालीन उद्योग का पुनर्जागरण

सुशासन कोई दूर का आदर्श नहीं, रोज़ की ज़िंदगी में महसूस होने वाली चीज़ है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने जो मॉडल खड़ा किया है, वह दिखाता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक संकल्प साथ हों तो तकनीक जनकल्याण का मज़बूत औज़ार बन सकती है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस मंत्र से भी सुर मिलाता है, जिसमें सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास को शासन की बुनियाद बताया गया है. डीबीटी ने इस दिशा में ठोस शुरुआत की है. बिचौलियों की भूमिका सिमटी है, रिसाव थमा है, भुगतान समय पर होने लगा है और नागरिक याचक से हक़दार बना है. 

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें