भारत में आग लगाने की कोशिश में था अमेरिका! PM मोदी के आगे नहीं गली ट्रंप की दाल, पकड़ ली गई चोरी, जानें पूरा मामला
US-India Trade Deal:अमेरिका ने दाल पर झूठ बोला. भारत में आग लगने ही वाली थी कि मोदी सरकार एक्टिव हुई. कॉमर्स सेक्रेटरी ने अमेरिका को पीछे धकेला और चंद घंटों में उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. पूरी स्टोरी जानिए.
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भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते (US-India Trade Deal) के बाद दुनिया ने राहत की सांस ली. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और सबसे पुराने लोकतंत्र के रिश्तों के बीच टैरिफ और ट्रेड का बैरियर आ रहा था, जिसे बातचीत और लगातार नेगोशिएशंस के जरिए हल किया गया. एक ओर जहां इस डील के बाद भारत एग्रीमेंट को आधिकारिक और कानूनी रूप दे रहा था, वहीं अमेरिका ने चुपके से भारत के साथ खेल करने की कोशिश की. यह महज कोशिश नहीं थी, बल्कि मोदी सरकार के खिलाफ विरोध और आंदोलन की लहर को हवा देने की संभावित साजिश थी. हालांकि चौकन्नी मोदी सरकार और भारत के ट्रेड सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने समय रहते व्हाइट हाउस की यह चाल पकड़ ली.
भारत ने पकड़ी अमेरिका की चोरी!
दरअसल अमेरिका-भारत व्यापार समझौते को लेकर अमेरिका ने अपनी ओर से एक फैक्ट शीट जारी कर दी, जिसने न सिर्फ नया विवाद खड़ा किया बल्कि भारत में बवाल की स्थिति भी पैदा कर सकता था. हुआ यह कि मोदी-ट्रंप या भारत-अमेरिका के बीच X पर जारी संयुक्त बयान में सहमति से तय की गई भाषा को दरकिनार करते हुए व्हाइट हाउस ने अपनी फैक्ट शीट में चुपचाप कुछ ऐसे शब्द जोड़ दिए, जिनका सीधा अर्थ भारत के साथ छल जैसा था. इसमें दालों के आयात को लेकर ऐसी भाषा डाली गई, जो लगभग कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोलने के संकेत देती थी.
भारत पर 500 अरब डॉलर के बोझ तले दबाने की कोशिश!
इतना ही नहीं, शब्दों में इस बदलाव से भारत पर करीब 500 अरब डॉलर के आयात का बाध्यकारी बोझ डालने की स्थिति बन सकती थी. यह कोई भूल या सामान्य संपादन नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित कूटनीतिक चाल थी, जिसे भारत सरकार के सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने पकड़ा और अमेरिका को फैक्ट शीट बदलने पर मजबूर कर दिया.
संयुक्त बयान में भारत ने स्पष्ट कहा था कि वह 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार की दिशा में आगे बढ़ने का इरादा रखता है. इसके लिए अंग्रेजी में “India intends to” शब्दों का प्रयोग किया गया था. लेकिन 9 फरवरी को 21:51 GMT पर व्हाइट हाउस ने अपनी फैक्ट शीट में इस शब्दावली को बदलकर “has committed to” कर दिया. यानी इरादे को प्रतिबद्धता में बदल दिया गया. यह बदलाव तकनीकी या भाषाई गलती नहीं था, बल्कि भारत को एक बाध्यकारी और संभावित रूप से खतरनाक ट्रेड डील की ओर धकेलने की कोशिश थी, जिस पर न सहमति बनी थी और न ही कोई हस्ताक्षर हुए थे.
दाल पर कैसे नहीं गल पाई ट्रंप की 'दाल'!
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. उसी फैक्ट शीट में “certain pulses” जैसे शब्द जोड़कर यह संकेत देने की कोशिश भी की गई कि भारत कृषि क्षेत्र, विशेषकर दालों में, अमेरिकी आयात को लेकर भी प्रतिबद्ध हो चुका है. यह भारत के किसानों और खाद्य सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील क्षेत्र पर सीधा दबाव बनाने जैसा था. यदि यह बदलाव अनदेखा रह जाता, तो यही संशोधित फैक्ट शीट अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आधिकारिक अमेरिकी दस्तावेज के रूप में पेश की जा सकती थी और बाद में अमेरिका इसी भाषा का हवाला देकर भारत पर व्यापारिक और राजनीतिक दबाव बना सकता था.
भयंकर राजनीतिक तूफान खड़ा हो सकता था!
इतना ही नहीं, इसके बाद भारत में राजनीतिक तूफान खड़ा हो सकता था कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के सामने घुटने टेक दिए और किसानों के हितों को दांव पर लगा दिया. इसके गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते थे, खासकर तब जब संसद का बजट सत्र पहले से ही हंगामेदार है और ट्रेड डील सहित कई मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है.
ट्रेड सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने पकड़ी अमेरिका की धूर्तता!
मोदी सरकार और ट्रेड सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल की इसलिए सराहना हो रही है कि भारत ने समय रहते इस शब्द-जाल को पकड़ लिया. खबरों के मुताबिक वाणिज्य मंत्रालय और राजेश अग्रवाल की टीम ने अमेरिका के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया और दस्तावेज को संशोधित करने पर जोर दिया. नतीजा यह हुआ कि 10 फरवरी 2026 को 18:38 GMT तक व्हाइट हाउस को उतनी ही चुपचाप यू-टर्न लेना पड़ा, जितनी चुपचाप बदलाव किया गया था. भारत के रुख के बाद व्हाइट हाउस ने बदले गए शब्द हटाए और संशोधन वापस ले लिया.
जानें कैसे शब्दों के जाल में फंस सकता था भारत!
संजीव गुप्ता (@sanjg2k1) ने व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट की ओर ध्यान दिलाया और बताया कि @waybackmachine पर उपलब्ध वेब आर्काइव और पेज-सोर्स के प्रमाण यह दर्शाते हैं कि फैक्ट शीट में परिवर्तन जानबूझकर किया गया था. सवाल अब भी कायम है, यदि भारत आपत्ति न जताता, तो क्या यही बदली हुई भाषा स्थायी रिकॉर्ड का हिस्सा बना दी जाती?
संजीव गुप्ता ने यह भी लिखा कि यह हरकत ट्रंप की उस पुरानी कार्यशैली की याद दिलाती है, जिसमें पहले अधिकतम दबाव की रणनीति अपनाई जाती है और विरोध होने पर बिना जवाबदेही के पीछे हट लिया जाता है. यह न केवल कूटनीतिक मर्यादा के विरुद्ध है, बल्कि साझेदारी की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है.
पीयूष गोयल भी फंस सकते थे मुश्किल में!
इस मामले का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल लगातार कहते रहे हैं कि 500 अरब डॉलर का आंकड़ा एक लक्ष्य है, कोई बाध्यकारी समझौता नहीं. यदि “has committed to” जैसी भाषा कायम रहती, तो यह भारत सरकार के आधिकारिक रुख को कमजोर करने और मंत्री के बयान को गलत साबित करने जैसा होता. हालांकि भारत ने अपने बयानों और दस्तावेजों के माध्यम से साफ कहा है कि वह किसी भी कीमत पर अपने हितों, रेड लाइन और किसानों के हितों से समझौता नहीं करेगा.
बहस केवल शब्दों की अदला-बदली तक सीमित नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि 500 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य व्यवहारिक रूप से कितना संभव है. मौजूदा व्यापार स्तर से यह लगभग ढाई गुना वृद्धि है. बिना स्पष्ट टाइमलाइन, सेक्टोरल रोडमैप और पारस्परिक रियायतों के यह लक्ष्य महज एक राजनीतिक घोषणा बनकर रह सकता है. केवल आंकड़ा घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है, उसे हासिल करने की ठोस रणनीति भी जरूरी है.
सबसे गंभीर चिंता घरेलू हितों को लेकर है. विशेष रूप से दाल और कपास उत्पादक किसान तथा परिधान उद्योग इस प्रकार के किसी भी असंतुलित समझौते से प्रभावित हो सकते हैं. ऐसे समय में जब अमेरिका बांग्लादेश के साथ भी आक्रामक व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहा है, भारतीय गारमेंट निर्यातक पहले से ही कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं. यदि अमेरिका भारत पर आयात खोलने का दबाव बनाए और साथ ही बांग्लादेश को प्राथमिकता दे, तो इसका सीधा असर भारतीय किसानों और उद्योग पर पड़ेगा.
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