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फिर टूटा ट्रंप का सपना… भारतीय मूल की नवनीतम को मिल गया शांति का नोबेल प्राइस, ‘Peace’ वाला दावा हवा-हवाई!
भारतीय मूल की नवनीतम पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलेगा. उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून में योगदान के लिए ये सम्मान मिला है. नेल्सन मंडेला के समय उन्होंने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नोबेल पाने की ख्वाहिश पर इस बार भी पानी फिर गया. नॉर्वे की नोबेल समिति ने भारतीय मूल की नवनीतम पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाएगा.
यह पुरस्कार उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए दिया गया है. नवनीतम पिल्लै को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा. उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी. 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए दिए जाएंगे.
क्या है नवनीतम पिल्लै का योगदान?
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नोबेल पुरस्कार समिति के अनुसार, साल 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार उस व्यक्ति को दिया जा रहा है, जिसने असाधारण साहस और ईमानदारी के साथ एक ज्यादा व्यापक वैश्विक कानूनी व्यवस्था की दिशा में नेतृत्व किया है. इस साल के विजेता नवनीतम ने यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई है कि युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों और नरसंहार के मामलों में कानूनी कार्रवाई हो. दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं पिल्लै ने रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले नेल्सन मंडेला समेत कई लोगों की मदद की थी.
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समिति ने बताया कि शांति पुरस्कार पाने वाली नावी पिल्लै ने देशों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह ठहराया है और हिंसा और संघर्ष के पीड़ितों के लिए उम्मीद जगाई है. नावी पिल्लै अंतरराष्ट्रीय कानूनी सिद्धांतों की महान पैरोकारों में से एक हैं. उनका शानदार करियर हमें कानून के वैश्विक शासन का समर्थन करने, उसे मजबूत करने और उसका विस्तार करने की जरूरत की याद दिलाता है. न्याय और मानवीय गरिमा के प्रति नावी पिल्लै की प्रतिबद्धता उन सभी लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत है, जो एक अधिक शांतिपूर्ण दुनिया बनाना चाहते हैं.
नोबेल पुरस्कार समिति के अनुसार, नावी पिल्लै का सार्वभौमिक कानूनी सिद्धांतों के प्रति समर्पण और सही-गलत को लेकर उनका मजबूत दृष्टिकोण उनके लंबे करियर की पहचान रहा है. दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रंगभेद के दौर में भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मी पिल्लै ने वकील बनकर कानूनी क्षेत्र में नई मिसाल कायम की.
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उन्होंने गहरे सामाजिक भेदभाव, नस्लीय अलगाव और बहिष्कार जैसी चुनौतियों का सामना किया. नेल्सन मंडेला और रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाने वाले अन्य लोगों का बचाव करने से लेकर हमारे समय के महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मामलों में न्यायाधीश के रूप में सेवा देने तक, उनके पूरे सफर में न्याय के लिए संघर्ष की एक समान धारा दिखाई देती है.
समिति ने कहा कि इस वर्ष की सम्मानित हस्ती नावी पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे और उसके प्रभाव को काफी बढ़ाया है. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट, रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में काम किया है. वह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त भी रह चुकी हैं और हाल तक कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र पर संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्ष थीं. आज नावी पिल्लै उस मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) की न्यायाधीश हैं, जिसमें म्यांमार पर नरसंहार का आरोप है.
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भारत से जुड़ी जड़ें
नवनीतम नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था, लेकिन परिवार भारतीय है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिल्लै के दादा भारत से दक्षिण अफ्रीका मजदूरी करने गए थे. उन्होंने एक हादसे में दोनों पैर गवां दिया था. बच्चे आर्थिक तंगी के बीच बड़े हुए.
पेशे से जज नवनीतम पिल्लै ने डरबन विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की थी. साल 1963 में ग्रेजुएशन और 1965 में कानून की डिग्री हासिल की. इसके बाद अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर और डॉक्टरेट की पढ़ाई की. इसके बाद जब रंगभेद के दौर में उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली तो खुद की लॉ फर्म शुरू की.
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समिति ने बताया कि ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय अदालत के मामलों में नावी पिल्लै ने दिखाया है कि कानूनी उपाय युद्ध और हिंसा को रोकने में मददगार हो सकते हैं. नावी पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ी संस्थाओं को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उनकी स्वतंत्र सोच, विशेषज्ञता और दृढ़ता ने उन्हें हमारे समय की सबसे सम्मानित अंतरराष्ट्रीय न्यायविदों में से एक बना दिया है.
फिर खाली हाथ रह गए ट्रंप
इधर नवनीतम पिल्लै को नोबेल प्राइस देने का ऐलान हुआ उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खेमा मुंह बनाकर रह गया. इस बार भी ट्रंप गुहार लगाते रह गए लेकिन नोबेल तो भारतीय मूल की नवनीतम पिल्लै की झोली में चला गया. इसी के साथ एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप का सपना चकनाचूर हो गया.
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चाहे भारत पाकिस्तान के बीच वॉर जैसी सिचुएशन हो, रूस-यूक्रेन की लड़ाई, इजरायल-हमास का युद्ध हो, भला ऐसा कौनसा मौका है जिसमें सीजफायर के दौरान ट्रंप ने क्रेडिट लेने का मौका न छोड़ा हो. वे खुद को शांतिदूत कहते रहे, जबकि असलियत ये है कि युद्ध की आग भड़काने में अमेरिका का भी हाथ माना गया.