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‘किस देश में युवा सरकार से सवाल पूछ सकते हैं?’, UN में गरजे इंडियन डिप्लोमैट, CJP प्रदर्शन पर रिपोर्ट को किया खारिज

भारतीय राजनयिक अनुज स्वरूप ने UN की रिपोर्ट पर पलटवार किया. उन्होंने भारत में ‘युवाओं के दमन’ के दावों को खारिज कर दिया. भारत ने UN को उसकी विश्वसनीयता पर भी आईना दिखाया.

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17 Oct 2026
( Updated: 17 Oct 2026
01:50 PM )
‘किस देश में युवा सरकार से सवाल पूछ सकते हैं?’, UN में गरजे इंडियन डिप्लोमैट, CJP प्रदर्शन पर रिपोर्ट को किया खारिज
Image Source- Screengrab/@IndiaUNNewYork
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भारत ने संयुक्त राष्ट्र के दोहरे रवैये और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं. कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान डिटेन करने पर UN ने चिंता जताते हुए रिपोर्ट जारी की थी. इस पर भारत ने एक बार फिर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. 

संयुक्त राष्ट्र महासभा की थर्ड कमेटी की न्यूयॉर्क में हुई बैठक में भारतीय राजनयिक अनुज स्वरूप ने भारत का रुख क्लियर किया. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की रिपोर्ट पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा क‍ि दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी के खिलाफ गुमनाम और अप्रमाणित आरोपों के आधार पर लगाए गए व्यापक आरोप कोई सबूत नहीं होते. अनुज स्वरूप ने रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए कहा, 

‘अगर भारत में युवाओं को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने की आजादी नहीं है तो फिर वे राजधानी तक मार्च कैसे कर रहे हैं और देश के वरिष्ठ नेताओं से बातचीत कैसे कर रहे हैं. किस दमनकारी देश में युवाओं का व्यंग्यात्मक समूह सरकार से सवाल पूछ सकता है?’

भारत ने खारिज की UN की रिपोर्ट

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भारत ने कहा क‍ि बिना पुष्टि वाली सुनी-सुनाई बातों पर आधारित मनमानी रिपोर्टों के कारण संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की विश्वसनीयता कम हो रही है. भारत ने 'शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता' की निगरानी करने वाले अधिकारी की एक रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज कर दिया है.  

अनुज स्वरूप ने कहा कि इसी तरह की मनमानी रिपोर्टिंग की वजह से संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़ी संस्थाओं की विश्वसनीयता कम हो रही है. उन्होंने कहा क‍ि यह सुनी-सुनाई बातों को संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का रूप देने जैसा है. 

UN की रिपोर्ट में क्या था?

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विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत के कुछ युवाओं ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य या लैंगिक न्याय जैसे मुद्दों पर बात करने के कारण उन्हें विरोध या सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ा. हालांकि, रिपोर्ट में इस दावे का आधार केवल एक 'सबमिशन' बताया गया था और स्रोत की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी. 

इस पर अनुज स्वरूप ने कहा, ‘जब कोई पदाधिकारी गुमनाम सूचनाओं के आधार पर 1.4 अरब लोगों के बारे में सामान्य निष्कर्ष निकालता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी के साथ न्याय नहीं करता.’

इसी सप्ताह यह दूसरा मौका था, जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. बुधवार को भी अनुज स्वरूप ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क पर अलग-अलग मामलों में अलग मानदंड अपनाने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि भारत के पड़ोसी देशों और पश्चिमी देशों में प्रदर्शनों पर हुई हिंसक कार्रवाइयों का कई बार रिपोर्टों में जिक्र तक नहीं किया जाता. स्वरूप ने कहा, ‘ऐसे दोहरे मानदंड लोगों का भरोसा कम करते हैं.’

रिपोर्ट की आलोचना करते हुए स्वरूप ने कहा कि दिलचस्प बात यह है कि उसी रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि भारत के युवाओं ने एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन खड़ा किया. UN की इस टिप्पणी को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संदर्भ में माना गया था. 

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UN की रिपोर्ट में ही दिखा दोहरा रवैया 

भारतीय राजनयिक स्वरूप ने कहा कि शायद जीना रोमेरो ने पिछले महीने मानवाधिकार परिषद में वोल्कर तुर्क का वह बयान नहीं देखा, जिसमें उन्होंने भारत में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों के संदर्भ में संवाद की सराहना की थी. 

7 सितंबर को तुर्क ने कहा था, ‘भारत में हालिया प्रदर्शनों ने दिखाया कि युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों के मामले में सबसे अच्छा जवाब बातचीत है, न कि जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग.’

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अनुज स्वरूप ने कहा कि भारत में लोकतंत्र के काम करने का सबसे बड़ा उदाहरण वह था, जब सार्वजनिक परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन किए. उन्होंने कहा क‍ि सरकार ने युवाओं के साथ रचनात्मक तरीके से बातचीत की और कुछ ही हफ्तों के भीतर संसद ने सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम में संशोधन कर दिया. 

उनके अनुसार, नए बदलावों में पेपर लीक के मामलों में सजा बढ़ाई गई, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार किए गए और परीक्षा धोखाधड़ी से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए राज्यों में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था की गई. 

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भारत की आलोचना के जवाब में जीना रोमेरो ने माना कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां युवाओं की आवाज शामिल करने के लिए कई संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सड़कों पर विरोध कर रहे युवाओं की मौजूदगी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 

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