'हर बार बनते हैं विवाद की वजह…', स्वामी जितेंद्रानंद ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर साधा निशाना, कहा- वो मामले को राजनीतिक रंग दे रहे

प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि कोर्ट में ऐसे प्रमाण हैं, जिनके आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य नहीं माना जा सकता.

'हर बार बनते हैं विवाद की वजह…', स्वामी जितेंद्रानंद ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर साधा निशाना, कहा- वो मामले को राजनीतिक रंग दे रहे
Swami Jitendranand Ji (File Photo)

संगम नगरी प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के स्नान को लेकर उठा विवाद अब सिर्फ एक धार्मिक मुद्दा नहीं रह गया है. यह मामला दिन पर दिन गहराता जा रहा है और संत समाज के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं. माघ मेले जैसे शांत और आध्यात्मिक आयोजन में इस तरह का विवाद कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है. 

कोर्ट में मौजूद हैं इनके खिलाफ प्रमाण: स्वामी जितेंद्रानंद

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रशासन की नोटिस मिलने के बाद लगातार प्रदेश सरकार के खिलाफ बयान दे रहे थे. इस मामलें में विवाद तब बढ़ गया जब प्रदेश की योगी सरकार का बचाव करते हुए अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर कड़ा बयान दिया. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कोर्ट में ऐसे प्रमाण मौजूद हैं, जिनके आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य नहीं माना जा सकता. उनका आरोप है कि ये हर बार विवाद की वजह बनते हैं और स्नान के दौरान अव्यवस्था फैला रहे थे. उनके इस बयान के बाद संत समाज के भीतर खींचतान और तेज हो गई.

ये करते हैं कोर्ट की अवहेलना: स्वामी जितेंद्रानंद

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा एक अहम दस्तावेज भी सार्वजनिक किया. उनके अनुसार, इस दस्तावेज में साफ लिखा है कि जब तक ज्योतिष पीठ शंकराचार्य पद को लेकर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक न तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और न ही कोई अन्य व्यक्ति शंकराचार्य के रूप में नियुक्त या पट्टाभिषेक कर सकता है. आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के तौर पर किसी भी तरह की सुविधा देना कोर्ट की अवमानना माना जाएगा. यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपील के रूप में लंबित है.

राजनीतिक रंग देने की कोशिश

इस पूरे घटनाक्रम को स्वामी जितेंद्रानंद ने राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विरोध में इस हद तक अंधे हो चुके हैं कि देशहित की सीमाएं भी लांघ रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बिहार में चुनाव लड़ने क्यों गए थे. इसे उन्होंने एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति करार दिया. उनके मुताबिक, शाही स्नान केवल अर्ध कुंभ और महाकुंभ में होता है, माघ मेले में नहीं. इसके बावजूद पालकी और विशेष व्यवस्था को लेकर विवाद खड़ा किया गया. उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि आखिर क्यों भीड़ के बीच जाकर व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की गई और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा करने का खतरा बढ़ाया गया.

मेला प्रशासन ने जारी किया था नोटिस 

विवाद के बीच प्रशासन भी सख्त रुख अपनाता नजर आ रहा है. सोमवार 19 जनवरी को मेला प्रशासन की ओर से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस जारी किया गया. इस नोटिस में उनके नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ लिखे जाने पर आपत्ति जताई गई थी. प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि कानूनी स्थिति साफ होने तक वे खुद को शंकराचार्य नहीं कह सकते. प्रदेश सरकार की इस कार्रवाई को स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने पूरी तरह सही ठहराया है. वहीं, दूसरी तरफ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी समाधान को लेकर अपनी बात रखी है. उन्होंने कहा कि वे संगम में सम्मानजनक तरीके से स्नान करेंगे और उसके बाद ही अपने शिविर में प्रवेश करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि जिन संन्यासियों, ब्रह्मचारियों और मातृशक्ति के साथ दुर्व्यवहार हुआ है, उनसे पहले क्षमा याचना होनी चाहिए. उनके अनुसार, सम्मानजनक समाधान में हो रही देरी समझ से परे है और इससे संत समाज की गरिमा को ठेस पहुंच रही है.

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बताते चलें कि यह पूरा मामला माघ मेले की शांति, व्यवस्था और उसकी मूल भावना पर सवाल खड़े करता है. एक ओर संत समाज के भीतर गहरे मतभेद सामने आ रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रशासन कानूनी प्रक्रिया का हवाला देकर अपने फैसलों पर कायम है. अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आपसी बातचीत और समझ से कोई रास्ता निकलता है या फिर यह विवाद और लंबा खिंचकर माघ मेले की छवि को नुकसान पहुंचाता रहेगा.

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