नहाने के बाद भी पूजा में बैठते ही क्यों छिड़का जाता है जल? जानें क्या कहती हैं धार्मिक मान्यताएं
हिंदू धर्म में पूजा से पहले स्नान करने के बावजूद जल के छींटे क्यों दिए जाते हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा शरीर, पूजा सामग्री और पूजा स्थल के शुद्धिकरण से जुड़ी है. इस दौरान 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा' मंत्र का जाप किया जाता है.
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हिंदू धर्म में पूजा-पाठ केवल देवी-देवताओं के सामने दीपक जलाने और फूल चढ़ाने तक सीमित नहीं है. पूजा की शुरुआत से लेकर समापन तक कई ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनका अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है. आपने अक्सर देखा होगा कि स्नान करने के बाद जब कोई व्यक्ति पूजा के लिए आसन पर बैठता है, तो पंडित जी उसके ऊपर, पूजन सामग्री और पूजा स्थल पर जल के छींटे देते हैं. इस दौरान एक विशेष मंत्र का उच्चारण भी किया जाता है.
ऐसे में मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब व्यक्ति पहले ही नहाकर स्वच्छ हो चुका है, तो पूजा शुरू करने से पहले दोबारा जल छिड़कने की आवश्यकता क्यों पड़ती है. दरअसल, धार्मिक मान्यताओं में इस परंपरा को बाहरी और आंतरिक शुद्धता के भाव से जोड़कर देखा जाता है. आइए जानते हैं कि पूजा से पहले जल छिड़कने की परंपरा के पीछे क्या मान्यता है और इसका आध्यात्मिक संदेश क्या है.
पूजा से पहले जल छिड़कने की परंपरा क्यों है खास?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में पूजा से पहले शुद्धिकरण का विशेष महत्व बताया गया है. स्नान करने से शरीर की सफाई होती है, लेकिन पूजा के लिए मन को शांत करना और विचारों को एकाग्र करना भी जरूरी माना जाता है. इसी भावना के साथ पूजा शुरू करने से पहले जल छिड़कने की परंपरा निभाई जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, जल के छींटे देते समय व्यक्ति स्वयं को पूजा के लिए तैयार करता है. यह प्रक्रिया रोजमर्रा की व्यस्तता, चिंताओं और दूसरी बातों से ध्यान हटाकर ईश्वर की आराधना पर केंद्रित होने का प्रतीक है. यही कारण है कि कई पूजा-पद्धतियों में यजमान के साथ-साथ आसन, पूजन सामग्री और पूजा स्थल का भी शुद्धिकरण किया जाता है. हालांकि, अलग-अलग संप्रदायों और पूजा-पद्धतियों में इस प्रक्रिया का तरीका अलग हो सकता है.
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'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा' मंत्र का क्या है अर्थ?
पूजा के दौरान जल छिड़कते समय एक प्रचलित संस्कृत मंत्र का पाठ किया जाता है. 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा. यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तरः शुचिः.' इस मंत्र का अर्थ है कि व्यक्ति चाहे किसी भी अवस्था में हो, भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करने से बाहरी और आंतरिक शुद्धता का भाव प्राप्त कर सकता है. पुण्डरीकाक्ष भगवान विष्णु का एक नाम है, जिसका अर्थ कमल के समान नेत्रों वाले भगवान से है. इस मंत्र के माध्यम से ईश्वर के स्मरण और पवित्रता के महत्व को बताया जाता है. धार्मिक विश्वास है कि पूजा से पहले इसका उच्चारण करने से मन में श्रद्धा, शांति और सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं. यहां शुद्धता का अर्थ केवल शरीर की स्वच्छता नहीं, बल्कि मन और भावनाओं को भी आराधना के लिए तैयार करना है.
जल को हिंदू धर्म में इतना पवित्र क्यों माना जाता है?
जल को जीवन का आधार माना जाता है. हिंदू धर्म में नदियों, तीर्थों और पवित्र जल का विशेष धार्मिक महत्व है. गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों के जल का उपयोग विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है. जल अर्पित करना, आचमन करना और पूजा सामग्री पर जल छिड़कना भी कई परंपराओं का हिस्सा है. पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु का क्षीरसागर में शयन और उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होने का प्रसंग मिलता है. उस कमल पर ब्रह्मा जी के प्रकट होने और सृष्टि की रचना से जुड़ी कथा हिंदू धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण मानी जाती है. इन कथाओं के कारण जल, सृष्टि और दिव्यता के बीच प्रतीकात्मक संबंध भी देखा जाता है.
शंख और कमल का भी है विशेष महत्व
पूजा में शंख का इस्तेमाल केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि शुभता का प्रतीक भी माना जाता है. कई अनुष्ठानों में शंख में जल भरकर उसका छिड़काव किया जाता है. इसी तरह फूल, अक्षत, फल और अन्य पूजन सामग्री पर भी जल छिड़कने की परंपरा है. कमल को पवित्रता और अनासक्ति का प्रतीक माना जाता है. कमल कीचड़ में खिलने के बावजूद अपनी सुंदरता और स्वच्छता के लिए जाना जाता है. इससे यह संदेश जोड़ा जाता है कि मनुष्य संसार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करे, लेकिन मोह-माया में इस तरह न उलझे कि वह अपने मूल्यों को भूल जाए.
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बताते चलें कि पूजा से पहले जल छिड़कने की परंपरा का संबंध धार्मिक शुद्धिकरण, ईश्वर के स्मरण और मन को एकाग्र करने से है. यह मान्यता का विषय है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित शुद्धिकरण प्रक्रिया नहीं. इसका आध्यात्मिक संदेश यही है कि पूजा करते समय केवल बाहरी स्वच्छता ही नहीं, बल्कि मन में श्रद्धा, विनम्रता और सकारात्मक भाव भी होने चाहिए. जब व्यक्ति जल के छींटों और मंत्रोच्चार के साथ पूजा शुरू करता है, तो वह स्वयं को कुछ समय के लिए सांसारिक भागदौड़ से अलग करके आराधना के लिए तैयार करता है. यही इस प्राचीन परंपरा का मूल भाव माना जाता है.