मणिकर्णिका घाट पर चिता के ठंडा होने के बाद क्यों लिखा जाता है 94? रहस्य जानकर हैरान रह जाएंगे आप!

मोक्ष नगरी काशी में बना मणिकर्णिका घाट सिर्फ एक घाट नहीं है बल्कि मोक्ष पाने का एक रास्ता भी है. महाकाल के भक्त आज भी चाहते हैं कि जब उनके प्राण निकले तो उनका दाह-संस्कार इसी घाट पर हो. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मणिकर्णिका घाट पर चिता के ठंडे होने के बाद 94 क्यों लिखा जाता है, इसके पीछे क्या रहस्य है, क्या और भी घाटों पर ये परंपरा निभाई जाती है, 94 के अलावा किसी दूसरे नंबर का उपयोग क्यों नहीं किया जाता है? आइए विस्तार से जानते हैं…

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05 Nov 2025
( Updated: 10 Dec 2025
09:03 PM )
मणिकर्णिका घाट पर चिता के ठंडा होने के बाद क्यों लिखा जाता है 94? रहस्य जानकर हैरान रह जाएंगे आप!

बनारस का मणिकर्णिका घाट सिर्फ एक घाट नहीं, बल्कि आस्था, मोक्ष और रहस्य का संगम है. यह वही जगह है जहां सदियों से लगातार चिताएं जलती आ रही हैं. यहां मृत्यु को भी उत्सव की तरह देखा जाता है. मणिकर्णिका घाट को काशी का महाश्मशान भी कहा जाता है. लेकिन, इस घाट से जुड़ी एक अनोखी परंपरा है, जो शायद ही कहीं और होती हो, वो है चिता की राख पर 94 लिखने की. 

मणिकर्णिका घाट पर चिता की ठंडी राख के ऊपर क्यों लिखा जाता है 94? 

मणिकर्णिका घाट पर जब शव का दाह संस्कार पूरा हो जाता है और चिताएं ठंडी होने लगती है, तब संस्कार करने वाला व्यक्ति राख पर लकड़ी या उंगली से 94 लिखता है. कहा जाता है कि यह प्रक्रिया मृत आत्मा की मुक्ति के लिए की जाती है. 94 को यहां मुक्ति मंत्र माना जाता है. मान्यता है कि इस अंक को भगवान शिव स्वयं स्वीकार करते हैं और आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाते हैं. लेकिन, आप भी सोच रहे होंगे ना कि 94 ही क्यों?

ठंडी चिता पर 94 ही क्यों लिखा जाता है? 

इसके पीछे भी एक मान्यता है कि हर मनुष्य के पास कुल 100 गुण माने जाते हैं. इनमें से 6 गुण जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ और हानि ऐसे हैं जो ब्रह्मा द्वारा पहले से तय किए गए हैं और इंसान के वश में नहीं होते. बाकी के 94 गुण उसके अपने होते हैं, जिन्हें वह अपने कर्म, विचार और आचरण से संभालता है. इसलिए मणिकर्णिका घाट पर 94 लिखने का अर्थ होता है कि अपने जीवन के सारे 94 कर्म भगवान शिव को समर्पित कर देना, ताकि आत्मा अपने कर्मों के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करे.

कब और कैसे शुरू हुई चिता की राख पर 94 लिखने की परंपरा? 

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यह परंपरा कब शुरू हुई, इसका सही समय कोई नहीं जानता, लेकिन यह पीढ़ियों से चली आ रही है. न तो किसी धार्मिक ग्रंथ में इसका जिक्र मिलता है, न किसी विशेष शास्त्र में, फिर भी यह विश्वास बनारस की आत्मा का हिस्सा बन गया है. यह प्रथा केवल मणिकर्णिका घाट तक सीमित है और इसके रहस्य को वही लोग समझते हैं जो यहां पीढ़ियों से अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं. मणिकर्णिका घाट की एक और खास बात यह है कि यहां हर शव का दाह संस्कार नहीं होता. यहां गर्भवती स्त्रियां, 12 वर्ष से छोटे बच्चे, सर्पदंश से मरे व्यक्ति या संत-महात्मा का दाह संस्कार नहीं किया जाता है.

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