गुरुवार को बन रहा अडल योग का अशुभ संयोग, जानें क्या करें, क्या न करें!

इस बार गुरुवार को अडल योग का अशुभ संयोग बन रहा है. हिंदू पंचांग के अनुसार इस दौरान शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है. लेकिन इस योग के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए आप गुरुवार के दिन व्रत रखकर अपने जीवन में आ रही अड़चनों को कम कर सकते हैं…

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12 Nov 2025
( Updated: 10 Dec 2025
02:14 PM )
गुरुवार को बन रहा अडल योग का अशुभ संयोग, जानें क्या करें, क्या न करें!

मार्गशीर्ष माह की नवमी तिथि गुरुवार को अडल योग का संयोग बन रहा है. इस दिन सूर्य तुला राशि में और चंद्रमा सिंह में रहेंगे. द्रिक पंचांग के अनुसार, गुरुवार को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 27 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय दोपहर 1 बजकर 26 मिनट से शुरू होकर 2 बजकर 47 मिनट तक रहेगा. इस तिथि को कोई विशेष पर्व नहीं है, लेकिन वार के हिसाब से आप गुरुवार को व्रत रख सकते हैं. ऐसा करना आपके लिए अच्छा रहेगा. 

अडल योग को क्यों माना जाता है अशुभ? 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अडल योग एक अशुभ योग माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है. ऐसे में बचने के लिए धर्मशास्त्रों में सूर्य पुत्र के पूजा की विधि बताई गई है, जिसे करने से उनकी कृपा बनी रहती है और दुष्प्रभाव भी खत्म होते हैं. 

गुरुवार को क्यों रखा जाता है व्रत? 

गुरुवार व्रत का उल्लेख अग्नि पुराण में मिलता है, जिसमें बताया गया है कि इस दिन श्री हरि ने काशी में शिवलिंग की स्थापना की थी, जिससे इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने का महत्व थोड़ा ज्यादा बढ़ जाता है.

गुरुवार को व्रत रखने के क्या फायदे हैं?   

धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि गुरुवार के दिन व्रत रखने से धन, समृद्धि, संतान और सुख-शांति की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि जो जातक इस दिन व्रत रखते हैं, उन्हें पीले वस्त्र धारण करने चाहिए और पीले फल-फूलों का दान करना चाहिए. ऐसा करने से लाभ मिलता है. वहीं, भगवान विष्णु को हल्दी चढ़ाने से मनोकामना पूरी होती है और पुण्य फल की प्राप्ति होती है.

गुरुवार के दिन क्यों की जाती है केले के पत्ते की पूजा? 

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गुरुवार के दिन किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न और धन का दान करने से भी पुण्य प्राप्त होता है. मान्यता है कि केले के पत्ते में भगवान विष्णु का वास होता है. इसी कारण गुरुवार के दिन केले के पत्ते की पूजा की जाती है. इस व्रत को किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से शुरू कर सकते हैं और 16 गुरुवार तक व्रत रखकर उद्यापन कर दें.

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