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Navratri 2026: महासप्तमी पर मां कालरात्रि की निशा पूजा का महत्व, जानें मंत्र और पूजा विधि

निशा पूजा महासप्तमी की रात को निशीथ काल में तकरीबन 4 घंटे चलती है. मां कालरात्रि को रात में खिलने वाले फूल, गुड़, या गुड़ से बनी चीजों का भोग लगाया जाता है. मां को शृंगार सामग्री अर्पित की जाती है. तांत्रिक या विशेष अनुष्ठानों में निशा पूजा के दौरान सांकेतिक पारंपरिक तरीके से बलि दी जाती है.

Navratri 2026: महासप्तमी पर मां कालरात्रि की निशा पूजा का महत्व, जानें मंत्र और पूजा विधि
Image Credit: AI Generated
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शारदीय नवरात्र के सातवें दिन शनिवार को देशभर में मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जा रही है. मां कालरात्रि और महाकाली की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए इस दिन निशा पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रात्रि के इस विशेष समय में देवी शक्ति और दैवीय ऊर्जा का प्रभाव अधिक प्रबल रहता है. 

कौन हैं मां कालरात्रि?

मान्यता है कि निशा पूजा के दौरान श्रद्धालु मां कालरात्रि की आराधना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. तांत्रिक परंपराओं में इस समय विशेष साधनाएं और उपासना भी की जाती हैं, जिन्हें देवी के उग्र एवं शक्तिशाली स्वरूप को प्रसन्न करने का माध्यम माना जाता है.

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नवरात्र का सातवां दिन आज, मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना से दूर होते हैं भय और बाधाएं

'काल' का अर्थ समय और मृत्यु है, तथा 'रात्रि' का अर्थ अंधकार है. यह पूजा जीवन के गहरे अज्ञान, भय, और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश करती है. मां कालरात्रि ने रक्तबीज और चंड-मुंड जैसे राक्षसों का वध किया था. इस रात्रि की पूजा से साधक के सभी शत्रुओं और विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं. मां कालरात्रि का संबंध न्याय के देवता शनि ग्रह से भी माना जाता है. इनकी आराधना से शनि के बुरे प्रभावों और पीड़ाओं से भी मुक्ति मिलती है.

निशा पूजा का क्या है धार्मिक महत्व?

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आधी रात (निशीथ काल) के सन्नाटे में की जाने वाली निशा पूजा साधक को मानसिक स्थिरता, साहस और 'सहस्रार चक्र' की जागृति की ओर ले जाती है. मां कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत उग्र और प्रभावशाली माना गया है. उन्हें गर्दभ (गधे) पर सवार, बिखरे केशों और बाहर निकली जिह्वा के साथ चित्रित किया जाता है,  फिर भी ये भक्तों को हमेशा शुभ फल देने वाली 'शुभंकारी' कहलाती हैं.

निशा पूजा महासप्तमी की रात को निशीथ काल में तकरीबन 4 घंटे चलती है. मां कालरात्रि को रात में खिलने वाले फूल, गुड़, या गुड़ से बनी चीजों का भोग लगाया जाता है. मां को शृंगार सामग्री अर्पित की जाती है. तांत्रिक या विशेष अनुष्ठानों में निशा पूजा के दौरान सांकेतिक पारंपरिक तरीके से बलि दी जाती है. इस दौरान पेठा, नारियल या अन्य पारंपरिक वस्तुओं की बलि दी जाती है. बलि देने का उद्देश्य नकारात्मकता की आहुति देना होता है. इस दौरान मां के बीज मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः' का जाप किया जाता है.

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मां कालरात्रि की पूजा विधि

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देश के कई देवी मंदिरों में निशा पूजा की जाती है. पश्चिम बंगाल के कालीबाड़ी मंदिरों, त्रिपुरा के उदयपुर में स्थित मां त्रिपुरेश्वरी मंदिर, बिहार के गोपालगंज में स्थित थावे भवानी मंदिर, बिहार के गया में स्थित मां मंगलागौरी मंदिर, जयपुर के आमेर महल में स्थित शिला माता मंदिर, यूपी के कुशीनगर में स्थित मां केटेश्वरी देवी मंदिर, बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थित मां कोटेश्वरी देवी मंदिर, बिहार के मुजफ्फरपुर में बगलामुखी मंदिर, यूपी के गोरखपुर में स्थित कौशकी देवी मंदिर, बिहार के बेतिया में स्थित काली बाग मंदिर, बिहार के मधुबनी में स्थित जयदुर्गा मंदिर, असम के कामाख्या मंदिर और तारापीठ जैसे सिद्ध स्थलों में निशा पूजा की जाती है.

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