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मां भुवनेश्वरी ने सपने में दिया था मंदिर बनाने का आदेश, जानिए सांगुड़ा सिद्धपीठ की पूरी कहानी
सांगुड़ा गांव को मां का मायका (नेगी वंश का क्षेत्र) माना जाता है. जिस भूमि पर मंदिर स्थापित है, वह पहले माणियारी रावत का तोक (क्षेत्र) था, जिसे मां की ससुराल कहा जाता है. सैलवाल जाति के ब्राह्मणों को यहां पूजा-अर्चना का दायित्व मिला, जो आज भी वंश परंपरा के अनुसार जारी है.
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देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा में देवी-देवताओं का वास है. ऐसी ही एक दिव्य और सिद्धस्थली है पौड़ी गढ़वाल जिले के सांगुड़ा में स्थित 'मां भुवनेश्वरी मंदिर'. इस सिद्धपीठ में मां भुवनेश्वरी की पिंडी की स्थापना 21 मार्च 1757 को की गई थी.
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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी की दर्शन की अपील
यह मंदिर न सिर्फ अपनी आध्यात्मिक शक्ति के लिए जाना जाता है बल्कि, यहां शांत वादियां हर किसी का मन मोह लेती हैं. शनिवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सभी से मंदिर में आकर दर्शन करने की अपील की.
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उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो पोस्ट कर लिखा, "पौड़ी गढ़वाल जिले के सांगुड़ा में मौजूद मां भुवनेश्वरी मंदिर आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का एक बड़ा केंद्र है. शांत और मनमोहक प्राकृतिक माहौल के बीच, मंदिर का आध्यात्मिक माहौल भक्तों को एक अनोखा अनुभव देता है. पौड़ी गढ़वाल जिले में आने पर, इस पवित्र मंदिर के दर्शन जरूर करें."
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शांत वादियों के बीच बसा है सिद्धपीठ
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यह सिद्धपीठ पौड़ी जिले के बिलखेत क्षेत्र के सांगुड़ा गांव में नारद गंगा की पावन गोद में बसी हुई है. यह सतपुली-देवप्रयाग मार्ग के मध्य स्थित है. मंदिर को लेकर ऐसी मान्यता है कि आक्रमणकारियों द्वारा पूजा स्थलों को अपवित्र किए जाने पर मां भुवनेश्वरी ने मातृंग पिंडी का रूप धारण किया था.
नमक की बोरी में प्रकट हुई थीं मां की पिंडी
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पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में जब लोग व्यापार के लिए पैदल नजीबाबाद और अन्य मंडियों से नमक व गुड़ लाते थे, तब सैनार गांव के नेगी बंधु (मोथा नेगी व उनके भाई) नजीबाबाद गए थे. वहीं नमक की बोरी में मां भुवनेश्वरी पिंडी (मातृलिंग) रूप में प्रकट हुईं.
क्यों खास है मां भुवनेश्वरी मंदिर?
नेगी बंधुओं और नैथाणा गांव के श्री नेत्रमणि नैथानी के स्वप्न में आकर माता रानी ने दर्शन दिए और उनसे अपनी पिंडी को सांगुड़ा में स्थापित करने का आदेश दिया. इसके बाद विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ 21 मार्च 1757 को सांगुड़ा में मां की पिंडी की स्थापना की गई.
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सांगुड़ा गांव को मां का मायका (नेगी वंश का क्षेत्र) माना जाता है. जिस भूमि पर मंदिर स्थापित है, वह पहले माणियारी रावत का तोक (क्षेत्र) था, जिसे मां की ससुराल कहा जाता है. सैलवाल जाति के ब्राह्मणों को यहां पूजा-अर्चना का दायित्व मिला, जो आज भी वंश परंपरा के अनुसार जारी है.