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UPI MDR चार्ज पर रोक से इंकार: RBI से लेकर केंद्र सरकार तक… सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस भेजकर मांगा जवाब
याचिका में MDR के फैसले को चुनौती दी गई. कहा गया है कि 2,000 रुपये से ज्यादा के मर्चेंट UPI ट्रांसफर पर लागू MDR के फैसले को रद्द किया जाए.
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UPI पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान शीर्ष अदालत ने सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इंकार कर दिया है. हालांकि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक से लेकर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है.
भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने केंद्र सरकार, RBI, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) समेत अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है. नोटिस में सभी पक्षों से चार हफ्ते में जवाब मांगा गया है. नोटिस में CJI ने सभी पक्षों से पूछा है कि चार्ज लगाना क्यों जरूरी है?
CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?
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शीर्ष अदालत ने UPI मामले में अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की है. याचिका में MDR के फैसले को चुनौती दी गई. कहा गया है कि 2,000 रुपये से ज्यादा के मर्चेंट UPI ट्रांसफर पर लागू MDR के फैसले को रद्द किया जाए. साथ ही, 15 सितंबर को घोषित उस फ्रेमवर्क को भी चुनौती दी गई है जिसके तहत 2,000 रुपए से रुपए के खास पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाया जाना है. सरकार का यह फैसला 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगा. उससे पहले मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है.
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याचिका में क्या कहा गया?
वकील अंजन दत्ता ने याचिका में सवाल उठाया कि नई MDR व्यवस्था का कानूनी आधार क्या है. याचिका में कहा गया UPI भुगतान पर शुल्क लगाने का फैसला पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लिया गया.
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याचिकाकर्ता का कहना है कि यह ढांचा मनमाना और भेदभावपूर्ण है और बिना किसी उचित कानूनी सुरक्षा के पूरे देश पर वित्तीय बोझ डालता है. याचिका में कहा गया है कि चुनौती सुरक्षित और मजबूत पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने के मकसद को नहीं, बल्कि उस तरीके को दी गई है जिससे वित्तीय बोझ बनाया, वर्गीकृत और बांटा गया है.
सरकार ने क्या तर्क दिया?
केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल आर वेंकटरमणी ने दलील दी. जिसमें उन्होंने कहा कि नए सिस्टम में UPI से होने वाले करीब 96 फीसदी मर्चेंट ट्रांजैक्शन इस व्यवस्था से प्रभावित नहीं होंगे. उन्होंने कहा, ये चार्ज 15 अक्टूबर से लागू होंगे और 96 प्रतिशत ट्रांजैक्शन पर यह चार्ज नहीं लगेगा.
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एन. वेंकटरमन यह भी कहा कि जरूरी सेवाओं के लिए चार्ज की सीमा 5 रुपए तय की गई है. यह जबरदस्ती कब्जा करने जैसा नहीं है. उन्होंने समझाया कि प्रस्तावित चार्ज पेमेंट एग्रीगेटर और बैंकों के बीच एक सेटलमेंट फीस है और सरकार को इसका कोई हिस्सा नहीं मिल रहा है.
उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने में बैंकों का खर्च आता है और क्रेडिट और डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगते हैं, जबकि यूपीआई पेमेंट को अब तक ऐसे चार्ज से छूट मिली हुई है. उन्होंने कहा कि UPI इकोसिस्टम को ठीक से काम करते रहने के लिए यह लेवी जरूरी है.
इन दलीलों को सुनने के बाद CJI की अध्यक्षता वाली बेंच ने हलफनामे पर संबंधित तथ्य और जानकारी मांगी और मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद के लिए तय कर दी.
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MDR सिस्टम पर उठे सवाल
MDR के खिलाफ याचिका में 2,000 रुपए की ट्रांजैक्शन सीमा 1 लाख रुपए की मासिक-प्राप्ति वर्गीकरण, अलग-अलग सेक्टर की दरें और 75,000 रुपए की अधिकतम सीमा तय करने के आधार पर सवाल उठाए गए हैं. याचिकाकर्ता का दावा है कि इन वर्गीकरणों के लिए कोई ठोस आधार नहीं बताया गया है.
याचिका में खुद उस सीमा पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि 2,001 रुपए के ट्रांजैक्शन पर प्रतिशत के हिसाब से शुल्क लगेगा, जबकि 2,000 रुपए के ट्रांजैक्शन पर नहीं.
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याचिकाकर्ता ने ढांचा तय करने में UPI और सेवा संचालन समिति की भूमिका को भी चुनौती दी है. उनका तर्क है कि दरें तय करने और वर्गीकरण से जुड़े अहम फैसले स्पष्ट विधायी नीति, मानकों, प्रकाशन और नियामक निगरानी के बिना किसी और को नहीं सौंपे जा सकते.
MDR को भ्रष्टाचार से जोड़ा
याचिकाकर्ता ने फ्रेमवर्क को लागू करने पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की और तर्क दिया कि अगर चार्ज लागू होते हैं तो भ्रष्टाचार बढ़ सकता है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण में रोक लगाने से इनकार कर दिया.
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यह याचिका 2,000 से ज्यादा के कुछ खास पी2एम यूपी ट्रांजैक्शन पर प्रस्तावित 0.4 फीसदी एमडीआर को चुनौती देती है. इसमें 75,000 और उससे ज्यादा के ट्रांजैक्शन के लिए चार्ज की सीमा 300 रुपए तय की गई है और कुछ सेक्टर के लिए अलग-अलग दरें रखी गई हैं.
इस याचिका में उस फैसले से जुड़े सभी रिकॉर्ड पेश करने की मांग की गई है. इसमें यूपीआई और सर्विसेज स्टीयरिंग कमिटी का कानूनी आधार, उसका गठन और अधिकार, उसके फैसले और मीटिंग की जानकारी और एमडीआर की दरें तय करने और प्राइवेट इकोसिस्टम में शामिल लोगों के बीच इसे बांटने का कानूनी आधार शामिल है.
केंद्र सरकार ने फैसले की क्या वजह बताई?
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केंद्र सरकार का कहना है कि बदले हुए फ्रेमवर्क का मकसद यूपीआई इकोसिस्टम की आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है. केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कहा था कि अधिक कीमत वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर थोड़ी फीस लेने से इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी और टियर 3-4 शहरों और ग्रामीण इलाकों में छोटे व्यापारियों की मदद के लिए फंड जुटाने में मदद मिलेगी.
केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि ग्राहकों के लिए यूपीआई मुफ्त रहेगा और व्यक्ति-से-व्यक्ति ट्रांजैक्शन, चाहे रकम कितनी भी हो, मुफ्त रहेंगे. सरकार ने कहा कि यूपीआई क्यूआर कोड के जरिए हर महीने 1 लाख रुपए तक कमाने वाले व्यापारियों पर कोई चार्ज नहीं लगेगा, जबकि 2,000 रुपए से कम के 95 प्रतिशत से ज्यादा मर्चेंट पेमेंट मुफ्त रहेंगे.
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RBI ने भी ज्यादा कीमत वाले यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लागू करने को डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की लंबे समय की स्थिरता को मजबूत करने की दिशा में एक कदम बताया है, साथ ही यह भी कहा है कि यूजर्स के लिए सभी यूपीआई ट्रांजैक्शन मुफ्त रहेंगे.