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मायावती सिर्फ दलितों की ही नहीं, ब्राह्मणों की भी सबसे बड़ी हितैषी! सबूत देखिए; पार्टी और सरकार में बनाया हिस्सेदार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीएसपी को अक्सर सिर्फ दलित राजनीति तक सीमित माना जाता है, लेकिन मायावती ने समय-समय पर ब्राह्मण समाज को भी सम्मान और प्रतिनिधित्व दिया है. हालिया विवाद में फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के नाम पर ब्राह्मण समाज के समर्थन में सामने आना इसी रणनीति की ओर इशारा माना जा रहा है.

Mayawati (File Photo)

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी बहुजन समाज पार्टी और उसकी प्रमुख मायावती का नाम आता है, तो एक वर्ग विशेष की राजनीति का आरोप अपने आप जुड़ जाता है. आम तौर पर यह कहा जाता है कि बीएसपी (BSP) सिर्फ दलित राजनीति तक सीमित रही है. लेकिन अगर बीते तीन दशकों की राजनीतिक यात्रा को गहराई से देखा जाए, तो यह धारणा पूरी तरह सही नहीं ठहरती. हकीकत यह है कि मायावती ने न केवल दलित समाज, बल्कि ब्राह्मण समाज को भी लगातार सम्मान, भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया है. यही वजह है कि एक बार फिर उनके हालिया कदमों को 2007 की सोशल इंजीनियरिंग से जोड़कर देखा जा रहा है.

दरअसल, ताजा मामला बॉलीवुड की एक फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के नाम को लेकर उपजे विवाद से जुड़ा है. इस मुद्दे पर जब ब्राह्मण समाज ने आपत्ति जताई, तो बीएसपी प्रमुख मायावती (Mayawati) खुलकर उनके समर्थन में सामने आईं. उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए ब्राह्मण समाज के सम्मान की बात कही और फिल्म के नाम पर सवाल उठाए. इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या मायावती एक बार फिर ब्राह्मण समाज को साथ लेकर बड़ा राजनीतिक दांव खेलने की तैयारी में हैं.

पार्टी के भीतर ब्राह्मणों को मिला सम्मान

मायावती के राजनीतिक फैसलों को देखें, तो यह साफ नजर आता है कि उन्होंने सिर्फ चुनावी समय पर नहीं, बल्कि संगठन के भीतर भी ब्राह्मण समाज को अहम स्थान दिया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण सतीश चंद्र मिश्रा हैं. ब्राह्मण समाज से आने वाले सतीश चंद्र मिश्रा को मायावती ने बीएसपी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया. पार्टी में उन्हें मायावती के बाद सबसे ताकतवर नेता माना जाता था. कार्यकर्ताओं के बीच यह आम धारणा थी कि मायावती के बाद अगर किसी का आदेश चलता है, तो वह सतीश चंद्र मिश्रा का है. इनके अलावा राकेश धर त्रिपाठी, नकुल दुबे, रंगनाथ मिश्रा जैसे तमाम दिग्गज नेता थे, जो पार्टी में ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व करते थे. इसके साथ ही मायावती ने ब्राह्मण भाईचारा समिति का गठन किया. इस समिति के जरिए ब्राह्मण समाज को संगठन से जोड़ने का काम किया गया. पार्टी के प्रवक्ता, संगठन सचिव और अन्य प्रमुख पदों पर ब्राह्मण नेताओं को जिम्मेदारी दी गई. यह सब महज दिखावे के लिए नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती के लिए किया गया कदम था.

2007 का चुनाव और सोशल इंजीनियरिंग

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2007 का विधानसभा चुनाव एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है. इसी चुनाव में मायावती ने अपनी चर्चित सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग किया. दलितों के साथ-साथ ब्राह्मणों को बड़ी संख्या में टिकट दिए गए. बीएसपी ने 2007 में 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा. यह अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संदेश था. इस चुनाव में बीएसपी के नारे भी बदले. पहले जहां पार्टी की पहचान सिर्फ दलित राजनीति से जुड़ी मानी जाती थी, वहीं अब नए नारे सुनाई देने लगे. ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारों ने साफ कर दिया कि मायावती ब्राह्मण समाज को सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि सम्मानित भागीदार मान रही हैं.

सरकार बनने के बाद भी निभाया वादा

2007 में सोशल इंजीनियरिंग का असर साफ दिखाई दिया. बीएसपी को पूर्ण बहुमत मिला और मायावती मुख्यमंत्री बनीं. इस चुनाव में 41 ब्राह्मण विधायक बीएसपी के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे. सरकार गठन के बाद मायावती ने अपने वादे को निभाया. उन्होंने 7 ब्राह्मण विधायकों को मंत्री बनाया. इतना ही नहीं, पूरे मंत्रिमंडल में 13 अपर कास्ट मंत्रियों को जगह दी गई. उस समय बीजेपी में सिर्फ 3, समाजवादी पार्टी में 11 और कांग्रेस में 2 ब्राह्मण विधायक थे. यह आंकड़े अपने आप में बताते हैं कि ब्राह्मण समाज को सबसे ज्यादा राजनीतिक हिस्सेदारी बीएसपी की सरकार में मिली.

2012 के बाद बदले हालात

2012 के बाद से मायावती की राजनीति उतार-चढ़ाव से गुजरती रही. वह सत्ता से बाहर हो गईं. लोकसभा में बीएसपी का एक भी सांसद नहीं है और विधानसभा में पार्टी सिर्फ एक विधायक तक सिमट गई. दलित वोट बैंक का एक हिस्सा भी समय के साथ खिसकता दिखा. ऐसे में मायावती के लिए राजनीतिक पुनरुत्थान बड़ी चुनौती बन गया. अब जब वह ब्राह्मण समाज के मुद्दों पर खुलकर बोल रही हैं, तो इसे उसी पुराने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है. 15 जनवरी को अपने जन्मदिन के मौके पर मायावती ने साफ कहा कि बीएसपी हमेशा से ब्राह्मणों का सम्मान करती आई है और अगर 2027 में सरकार बनी, तो ब्राह्मण समाज को पूरा सम्मान दिया जाएगा.

19 साल पहले क्यों साथ आए थे ब्राह्मण

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक 2007 और 2026 के बीच करीब 19 साल का अंतर है. इस दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है. 2007 में मुलायम सिंह यादव की सरकार के खिलाफ माहौल था. कांग्रेस और भाजपा दोनों कमजोर स्थिति में थीं. ऐसे में ब्राह्मण समाज ने मायावती को एक मजबूत विकल्प के रूप में देखा और उनके साथ खड़ा हुआ. आज हालात अलग हैं. भाजपा सत्ता में है और समाजवादी पार्टी भी मजबूत दावेदार बनी हुई है. लेकिन इसके बावजूद ब्राह्मण समाज के भीतर उपेक्षा और असंतोष की चर्चा सामने आ रही है. मायावती इसी असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करती दिख रही हैं.

ब्राह्मणों से किया भरोसे का वादा

लखनऊ में बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर प्रतिक्रिया देते हुए मायावती ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार में ब्राह्मणों की स्थिति अच्छी नहीं है. हमारी सरकार में ब्राह्मण समाज का पूरा सम्मान किया गया. ब्राह्मणों को किसी पार्टी की बाटी-चोखे की जरूरत नहीं है. भाजपा, सपा और कांग्रेस में ब्राह्मण समाज की उपेक्षा हुई है, जबकि बसपा ने हमेशा टिकट और सम्मान दिया है. मायावती का कहना है कि अगली बार सरकार बनने पर ब्राह्मण समाज का पूरा ख्याल रखा जाएगा. उन्होंने ब्राह्मण समाज से अपील की कि वे किसी के बहकावे में न आएं और अपने स्वाभिमान के साथ फैसला करें.

क्या दोहराएगी 2007 की कहानी

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मायावती एक बार फिर 2007 वाला फॉर्मूला दोहरा पाएंगी. राजनीतिक हालात बदले हैं, लेकिन मायावती का संदेश साफ है. वह खुद को फिर से एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में पेश कर रही हैं. ब्राह्मण समाज को दिया गया सम्मान और भागीदारी का भरोसा इसी रणनीति का अहम हिस्सा है.

बताते चलें कि आने वाले विधानसभा चुनाव यह तय करेंगे कि मायावती की यह नई सक्रियता सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहती है या फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिलता है. फिलहाल इतना तय है कि ब्राह्मण समाज के सम्मान को लेकर मायावती का रुख उनकी राजनीति का केंद्र बन चुका है.

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