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'भारत हमारा दोस्त, ऐसे टैरिफ नहीं लगा सकते...', रूसी तेल पर छूट को लेकर बोला अमेरिका, कहा-निर्भरता खत्म नहीं कर सकते
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने रूसी तेल की खरीद पर दिए गए छूट पर कहा कि भारत अहम साझेदार है, ऐसे अमेरिका टैरिफ नहीं लगा सकता है. उन्होंने कहा भारत के लिए तुरंत रूस से निर्भरता खत्म करना आसान नहीं है.
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अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले का बचाव किया है, जिसमें रूस से जुड़े प्रतिबंधों के मामले में 60 दिन की छूट दी गई है. उन्होंने कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साझेदार है और वह अब भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक रूसी तेल पर निर्भर है. ऐसे में एक साथ टैरिफ और प्रतिबंध लागू करने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है.
रूसी तेल पर छूट को लेकर क्या बोला अमेरिका?
एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बात करते हुए रुबियो ने कहा कि अमेरिका को इन कदमों के व्यापक आर्थिक प्रभाव का आकलन करने के लिए समय चाहिए. खासकर तब, जब मध्य पूर्व और यूक्रेन में चल रहे संघर्ष पहले से ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर रहे हैं.
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रुबियो की यह टिप्पणी रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज की आलोचना के जवाब में आई. क्रूज ने 60 दिन की इस छूट को गलती बताते हुए कहा था कि इससे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फायदा मिलेगा.
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'रूसी तेल लेना बंद नहीं कर सकता भारत'
रुबियो ने कहा, "मुद्दा सिर्फ रूस पर प्रतिबंधों का नहीं है. इसमें भारत समेत कई देशों पर लगने वाले टैरिफ भी शामिल हैं." उनके मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप इस 60 दिन की अवधि का इस्तेमाल यह समझने के लिए करना चाहते हैं कि अगर प्रतिबंध और टैरिफ दोनों एक साथ लागू किए जाएं तो उसके क्या नतीजे हो सकते हैं. रुबियो ने माना कि भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है लेकिन रूस से ऊर्जा आयात को तुरंत बंद करना आसान नहीं है.
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'भारत अमेरिका का एक अहम मित्र और साझेदार'
उन्होंने कहा, "भारत जैसे देशों ने स्वेच्छा से अपने ऊर्जा स्रोतों में बदलाव किया है लेकिन फिर भी वे रूस से काफी मात्रा में ऊर्जा खरीद रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि एक दिन में पूरी व्यवस्था बदलना संभव नहीं होता. साथ ही, भारत अमेरिका का एक अहम मित्र और साझेदार भी है."
रुबियो ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को प्रभावित करने वाली कई घटनाओं पर नजर रख रहा है. इनमें ईरान से जुड़ा संघर्ष, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की स्थिति, सऊदी अरब पर हूती हमले और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा ढांचे को हुआ नुकसान शामिल हैं.
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अमेरिका ने क्यों दी भारत को रूस से तेल खरीदने पर छूट?
उनका कहना है कि इन सभी घटनाओं से वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ा है और प्रतिबंधों को लागू करने का फैसला और अधिक जटिल हो गया है. रुबियो ने कहा कि 60 दिन की छूट इसलिए दी गई है, ताकि सरकार इस कानून के संभावित प्रभावों का ठीक से अध्ययन कर सके. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति को यह समझने के लिए समय चाहिए कि इन परिस्थितियों में सही संतुलन क्या होगा और कौन-सा रास्ता सबसे बेहतर रहेगा.
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह छूट और रूसी डीजल से जुड़ी दूसरी व्यवस्था पुतिन को राहत देने जैसी है, तो उन्होंने इस बात से इनकार किया. रुबियो ने कहा, "वह डीजल किसी न किसी तरीके से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकना ही था."
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'भारत तुरंत अमेरिका से रूसी तेल से निर्भरता खत्म नहीं कर सकता'
उन्होंने बताया कि पहले भी अमेरिका ने 60 दिन की छूट दी थी, जब होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल परिवहन में दिक्कतें आ रही थीं. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्ष अब एक-दूसरे को प्रभावित करने लगे हैं और उनका असर सिर्फ युद्ध वाले देशों तक सीमित नहीं है. उन्होंने कहा कि दुनिया भर के ये संघर्ष अब एक-दूसरे से टकरा रहे हैं. इनका असर सिर्फ तेल और डीजल की कीमतों पर ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.
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उन्होंने माना कि अमेरिका में भी लोग बढ़ी हुई ऊर्जा कीमतों का असर झेल रहे हैं, लेकिन कुछ अन्य देशों की स्थिति इससे भी ज्यादा कठिन है. रुबियो के ताजा बयान यह दिखाते हैं कि अमेरिका के सामने एक चुनौती यह है कि वह एक तरफ रूस पर दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के साथ अपने आर्थिक संबंधों को भी संभालकर रखना चाहता है.
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भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले देश की जरूरतों, सस्ती कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं. फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में आई उथल-पुथल के बीच रूसी कच्चा तेल भारत के आयात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.