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पुलिसकर्मियों का मोटरसाइकिल भत्ता ₹700 से बढ़कर ₹1,000, वर्दी भत्ता ₹15 हजार और सिम भत्ता ₹2,500 होगा: CM योगी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बताया कि पिछले एक वर्ष में देशभर में 154 पुलिसकर्मियों ने कर्तव्यपालन के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी. इनमें उत्तर प्रदेश के छह पुलिसकर्मी उपनिरीक्षक सत्यभान सिंह, उपनिरीक्षक मोहित कुमार यादव, आरक्षी अशोक कुमार, आरक्षी प्रदीप कुमार, फायर सर्विस चालक वीरपाल सिंह और फायरमैन मोहित कुमार शामिल हैं.
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को पुलिस स्मृति दिवस-2026 के अवसर पर लखनऊ में आयोजित स्मृति परेड में पुलिसकर्मियों के भत्तों में बढ़ोतरी की तीन महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं. उन्होंने कहा कि फील्ड ड्यूटी में तैनात उपनिरीक्षकों और निरीक्षकों का मोटरसाइकिल भत्ता 700 रुपये से बढ़ाकर 1,000 रुपये प्रतिमाह किया जा रहा है. पीपीएस संवर्ग के अधिकारियों का वर्दी भत्ता 6,400 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये किया जाएगा. इसके साथ ही फील्ड ड्यूटी में तैनात आरक्षियों और मुख्य आरक्षियों का सिम भत्ता 2,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये किया जा रहा है.
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने पुलिस शहीद स्मारक स्थल पर पुष्पचक्र अर्पित कर अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी. इसके पश्चात वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों ने भी पुष्पांजलि अर्पित कर वीर शहीदों को नमन किया. मुख्यमंत्री ने कर्तव्यपालन के दौरान अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले पुलिसकर्मियों को नमन करते हुए कहा कि शहीदों के प्रति राष्ट्र का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता. पुलिसकर्मियों की मुस्तैदी और कर्तव्यनिष्ठा ही प्रदेश में कानून का राज स्थापित करने की आधारशिला है.
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पूरा देश विजयादशमी मना रहा था, पुलिसकर्मी मुस्तैदी से ड्यूटी निभा रहे थे
मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी बच्चे का सुरक्षित विद्यालय पहुंचना, किसी बेटी का निर्भय होकर घर से बाहर निकलना, किसी व्यापारी का बिना भय अपना कारोबार करना और किसी नागरिक को संकट के समय सहायता मिलना सामान्य घटनाएं दिखाई देती हैं, लेकिन इनके पीछे पुलिसकर्मियों का निरंतर परिश्रम, सतर्कता और असाधारण दायित्वबोध होता है. जब पूरा देश विजयादशमी का उत्सव मना रहा था, परिवार खुशियां बांट रहे थे और जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जा रहे थे, तब पुलिसकर्मी मुस्तैदी से ड्यूटी निभा रहे थे, ताकि प्रत्येक नागरिक निर्भय होकर त्योहार का आनंद ले सके. शहीदों के नाम केवल स्मारकों पर अंकित नहीं होते, वे राष्ट्र की नैतिक चेतना में अंकित रहते हैं. हम उनके जीवन की सभी परिस्थितियों को भले न जानते हों, लेकिन उनके अंतिम निर्णय का महत्व अवश्य समझ सकते हैं. जब कर्तव्य और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच कठिन चुनाव की घड़ी आई, तब उन्होंने कर्तव्य को प्राथमिकता दी. उनके साहस पर हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा होता है और उनके प्रति कृतज्ञता हमें अपने दायित्वों का बोध कराती है.
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हॉट स्प्रिंग की घटना से जुड़ा है पुलिस स्मृति दिवस
मुख्यमंत्री ने पुलिस स्मृति दिवस के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि 21 अक्टूबर, 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद सरकार की स्थापना कर भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष को ऐतिहासिक स्वरूप दिया था. इसी तारीख को वर्ष 1959 में लद्दाख के हॉट स्प्रिंग क्षेत्र में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 10 वीर जवानों ने चीनी सैनिकों के घात लगाकर किए गए हमले का बहादुरी से सामना करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. एक ओर स्वतंत्रता के संकल्प का इतिहास है, तो दूसरी ओर राष्ट्र की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान की गाथा. दोनों घटनाएं त्याग, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देती हैं. विजयादशमी के अगले दिन पुलिस स्मृति दिवस का आयोजन बुराई पर अच्छाई की विजय के संदेश को और भी गहरा करता है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने वर्ष 2018 में राष्ट्रीय पुलिस स्मारक राष्ट्र को समर्पित करते हुए पुलिस बलों के गौरवशाली इतिहास, साहस और बलिदान की स्मृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने पर बल दिया था. स्मारक पर अंकित प्रत्येक नाम अपने भीतर एक कहानी समेटे हुए है. किसी जवान ने परिवार के साथ भविष्य की योजनाएं बनाई होंगी, किसी ने अपने बच्चे को आगे बढ़ते देखने का सपना संजोया होगा और किसी ने माता-पिता की सेवा का संकल्प लिया होगा. लेकिन कर्तव्य की पुकार आने पर उन्होंने व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर राष्ट्र और समाज की सुरक्षा को रखा. अटल जी की सरकार ने राष्ट्रीय पुलिस स्मारक बनाने की पहल की थी, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के कारण इस काम को लटकाया गया. पुलिस के अमर शहीदों का सम्मान किसी राजनीतिक विचार तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का विषय है.
पहले अपराधी को हाथ लगाते ही सत्ता के गलियारों से आने लगते थे फोन
मुख्यमंत्री ने पूर्ववर्ती सपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि एक दौर ऐसा भी था, जब पुलिस का थानेदार या एसपी किसी अपराधी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले सोचता था, क्योंकि अपराधी के खिलाफ कदम उठाते ही सत्ता के गलियारों से फोन आने लगते थे. कुछ ही घंटों में अपराधी के बजाय अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हो जाती थी. पुलिस को अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय सत्ता से जुड़े लोगों के निजी कामों में उलझाया जाता था. थानों में सीलन भरी बैरकें और खपरैल की टपकती छतें थीं. पीएसी की कंपनियों को बंद करने के प्रयास किए जा रहे थे. अपराधी खुलेआम हथियार लहराते थे, जबकि पुलिसकर्मियों के पास पुराने और जंग लगे हथियार थे. अपराधियों का समानांतर राज स्थापित हो गया था और कानून तमाशबीन बना हुआ था. जो लोग पुलिस की कार्रवाई, मुठभेड़ और जीरो टॉलरेंस की नीति पर सवाल उठाते हैं, वही दुर्दांत माफिया और आतंकियों के मारे जाने पर उनके समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं. लेकिन जब माफिया की गोलियों से कोई निर्दोष पुलिसकर्मी शहीद होता है, तब उसके अनाथ बच्चों के आंसू पोंछने के लिए संवेदना नहीं दिखाई देती. जब व्यापारी का अपहरण होता था या बहन-बेटियों के सम्मान पर हमला होता था, तब भी ऐसे लोगों की संवेदना सामने नहीं आती थी. आज अपराधियों को पता है कि उत्तर प्रदेश में उनका आखिरी ठिकाना कहां है.
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मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले पुलिस में हजारों पद खाली पड़े थे. इसकी वजह केवल संसाधनों का अभाव नहीं, बल्कि अपने-पराये की भेदभावपूर्ण नीति थी. थाने की कुर्सी पर भले ही उपनिरीक्षक या निरीक्षक बैठता था, लेकिन फैसले कहीं और से आते थे. वर्ष 2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में 815 दंगे हुए. हर दंगे का असर किसी गरीब की दुकान, मजदूर की दिहाड़ी और बच्चे की पढ़ाई पर पड़ता था. मथुरा के जवाहर बाग की घटना इसका उदाहरण है, जहां कब्जा करने वालों को संरक्षण मिला और पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी तथा थानाध्यक्ष संतोष यादव को अपने प्राण गंवाने पड़े.
2017 के बाद पुलिस के हाथों से राजनीतिक बेड़ियां तोड़ीं
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2017 में सरकार बनने के बाद पुलिस के हाथों की राजनीतिक बेड़ियां तोड़ी गईं. पुलिस से स्पष्ट कहा गया कि गरीब, पीड़ित, व्यापारी और बहन-बेटियों के सम्मान की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन समाज में आतंक फैलाने वाले अपराधी, माफिया और दंगाइयों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाए. शीत ऋतु की ठिठुरन, जेठ की झुलसाती दोपहरी और भारी बारिश में पुलिसकर्मी सड़कों पर मुस्तैद रहते हैं. यदि पुलिस माफिया के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई नहीं करती, तो क्या कोई उद्योगपति उत्तर प्रदेश में निवेश करने आता? जिस प्रदेश में पांच वर्षों में 815 दंगे हुए थे, वहां आज दंगों के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता. दंगों का इतिहास अब किताबों में सिमट गया है. उत्तर प्रदेश उपद्रव से उत्सव प्रदेश बन चुका है. माफिया तत्वों की 15 हजार करोड़ रुपये से अधिक की अवैध संपत्ति जब्त की गई है. माफिया के कब्जे से मुक्त कराई गई जमीन पर गरीबों के लिए आवास बनाए जा रहे हैं. हाल में प्रयागराज में ऐसे ही 602 फ्लैटों के निर्माण के लिए भूमि पूजन किया गया है.
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पुलिस कमिश्नरेट, भर्ती और प्रशिक्षण क्षमता में बढ़ोतरी
मुख्यमंत्री ने पुलिस व्यवस्था में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश के सात बड़े शहरों में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू की जा चुकी है. वर्ष 2017 से पहले उत्तर प्रदेश पुलिस के पास एक साथ केवल 6 हजार पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण देने की क्षमता थी. पिछले नौ वर्षों में इसे बढ़ाकर 60 हजार किया गया है. प्रदेश में बिना पक्षपात और लेनदेन के 2.26 लाख से अधिक पुलिसकर्मियों की भर्ती की गई है, जबकि 35 हजार पदों पर भर्ती की प्रक्रिया अंतिम चरण में है. पुलिस में महिला कार्मिकों की संख्या 10 हजार से बढ़कर 45 हजार हो गई है. कुशल खिलाड़ी योजना के तहत एक हजार पदक विजेता खिलाड़ी उत्तर प्रदेश पुलिस की वर्दी पहनकर सेवा दे रहे हैं. एशियन गेम्स में एथलेटिक्स की पारुल चौधरी, कबड्डी के अर्जुन देशवाल, क्रिकेट की दीप्ति शर्मा और हॉकी के राजकुमार पाल जैसे खिलाड़ियों ने पदक जीतकर देश और उत्तर प्रदेश पुलिस का नाम रोशन किया है.
फॉरेंसिक संस्थान से साइबर अपराधों तक, तकनीकी क्षमता का विस्तार
मुख्यमंत्री ने कहा कि माफिया के कब्जे से मुक्त कराई गई भूमि पर लखनऊ में देश के सबसे आधुनिक फॉरेंसिक संस्थानों में से एक का निर्माण किया गया है. अब हर जनपद में साइबर थाना और हर थाने में साइबर हेल्प डेस्क उपलब्ध है. इससे साइबर अपराधों की शिकायतों पर कार्रवाई, जांच और पीड़ितों को सहायता उपलब्ध कराने की क्षमता बढ़ी है. पूर्ववर्ती सरकारें आतंकियों के मुकदमे वापस लेने की पैरवी करती थीं, जबकि आज उत्तर प्रदेश एटीएस ने देवबंद से लेकर सीमावर्ती जनपदों तक नए कमांड सेंटर स्थापित किए हैं. राष्ट्रविरोधी ताकतों, स्लीपर सेल और घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई कर उनकी कमर तोड़ने का काम किया गया है. पेपर लीक माफिया, जहरीली शराब के कारोबारियों, एके-47 लहराने वाले कुख्यात अपराधियों, डकैतों और आतंकियों के खिलाफ एसटीएफ की कार्रवाई ने साबित किया है कि उत्तर प्रदेश में कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता.
महिला पीएसी बटालियनों का गठन, बंद कंपनियों को किया पुनर्जीवित
मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों ने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते पीएसी की कंपनियों को बंद करने का काम किया था. वर्तमान सरकार ने उन कंपनियों को पुनर्जीवित किया और वीरांगना ऊदा देवी पासी, वीरांगना झलकारी बाई कोरी तथा वीरांगना अवंती बाई लोधी के नाम पर तीन नई महिला पीएसी बटालियनों का भी गठन किया है. इससे पीएसी के गौरव को पुनर्स्थापित करने के साथ महिला पुलिसकर्मियों की भागीदारी और क्षमता को भी बढ़ावा मिला है. पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के लिए सैलरी पैकेज के तहत पांच लाख कैशलेस हेल्थ कार्ड बनाए जा चुके हैं. पुलिसकर्मियों के कल्याण, बेहतर सुविधाओं और आधुनिक संसाधनों की उपलब्धता से उनका मनोबल मजबूत होता है तथा वे अपने दायित्वों का निर्वहन अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं.
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औपनिवेशिक कानूनों की जगह नई न्याय संहिताएं
मुख्यमंत्री ने कहा कि देश को लंबे समय तक औपनिवेशिक कानूनों की बेड़ियों में जकड़े रखा गया. अंग्रेजों का पुलिस एक्ट और भारतीय दंड संहिता जैसे कानून भारतीय नागरिकों को न्याय देने के बजाय उन्हें गुलाम बनाए रखने और उन पर दमन करने की मानसिकता से बनाए गए थे. औपनिवेशिक सोच को बनाए रखने वाली ताकतें हर प्रगतिशील कदम का विरोध करती रही हैं. आज दमनकारी औपनिवेशिक कानूनों को समाप्त कर भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू किए जा चुके हैं. इन कानूनों का उद्देश्य भारतीय परिस्थितियों और नागरिकों की आवश्यकताओं के अनुरूप न्याय व्यवस्था को आगे बढ़ाना है. मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि जिन लोगों ने केवल अपने परिवारों के स्मारक बनाने पर ध्यान दिया, उन्हें वीर जवानों के सम्मान और स्मृति की चिंता नहीं रही. पुलिस शहीदों का सम्मान राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता और उनके बलिदान को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का दायित्व है.
पिछले एक वर्ष में यूपी के छह जवानों समेत 154 पुलिसकर्मी शहीद
मुख्यमंत्री ने बताया कि पिछले एक वर्ष में देशभर में 154 पुलिसकर्मियों ने कर्तव्यपालन के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी. इनमें उत्तर प्रदेश के छह पुलिसकर्मी उपनिरीक्षक सत्यभान सिंह, उपनिरीक्षक मोहित कुमार यादव, आरक्षी अशोक कुमार, आरक्षी प्रदीप कुमार, फायर सर्विस चालक वीरपाल सिंह और फायरमैन मोहित कुमार शामिल हैं. वर्ष 2017 के बाद अपराध के विरुद्ध अभियानों में उत्तर प्रदेश के 18 पुलिसकर्मी शहीद हुए हैं और 1,953 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. शहीद इंस्पेक्टर सुनील कुमार को इस वर्ष मरणोपरांत राष्ट्रपति वीरता पदक प्रदान किया गया है. पुलिस सैलरी पैकेज के अंतर्गत शहीदों के आश्रितों को अब तक 425 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता दी जा चुकी है. शहीद पुलिसकर्मियों के परिवारों का सम्मान और उनकी सहायता सरकार का दायित्व है. पुलिसकर्मियों का बलिदान यह याद दिलाता है कि नागरिकों की सुरक्षा और कानून का राज स्थापित करने के लिए वे किस स्तर तक समर्पण करते हैं.
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कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण, पुलिस महानिदेशक पीएसी आलोक सिंह, जनप्रतिनिधिगण, प्रशासन और पुलिस के अधिकारीगण और शहीद परिवारों के परिजन उपस्थित रहे.