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‘पंडितों के बिना अधूरा है कश्मीर…’, पूर्व CM फारूक अब्दुल्ला की भावुक अपील, बोले- हमने बहुत कुछ खो दिया है, सभी वापस लौट आएं
जम्मू-कश्मीर में हालात बदलते दिख रहे हैं. सुरक्षा में सुधार के बीच फारूक अब्दुल्ला के सुर भी नरम हुए हैं. उन्होंने कश्मीरी पंडितों की वापसी की अपील करते हुए कहा कि कश्मीर सभी समुदायों का है और पंडितों के बिना अधूरा है.
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जम्मू-कश्मीर की सियासत और फिजाओं में मौजूदा वक्त में कई तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं. बीते 10 वर्षों में कश्मीर में सुरक्षा को लेकर लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है. वहीं, एक ओर नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के बयानों में नरमी और समावेशिता नजर आ रही है, तो दूसरी ओर प्रशासन नशे के खिलाफ सख्त अभियान चला रहा है. इन दोनों घटनाओं ने घाटी के भविष्य को लेकर नई उम्मीदें जगाई हैं.
फारूक अब्दुल्ला के बदले सुर
फारूक अब्दुल्ला के बयान पहले कुछ बयान विवादित माने जाते थे, वहीं अब वह कश्मीरी पंडितों की वापसी की खुलकर बात कर रहे हैं. उन्होंने साफ कहा कि कश्मीर सभी समुदायों का है और पंडितों के बिना यह अधूरा है. शनिवार को प्रख्यात कश्मीरी पंडित डॉ. सुशील राजदान की पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने 1990 के दशक के पलायन को घाटी के लिए सबसे बड़ा नुकसान बताया. उन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा कि जो लोग कश्मीर छोड़कर चले गए, वे वापस लौटें और अपने घरों में फिर से खुशहाली के साथ रहें. उन्होंने कहा,'मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि जो लोग यहां से चले गए, वे अपने घरों को वापस लौटें और एक बार फिर खुशहाली से रहें. हमने बहुत कुछ खो दिया है. कश्मीर हिंदू, मुस्लिम और सिख, सभी का है. यही इस जगह की असली पहचान है.'
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कश्मीरी पंडितों ने क्यों किया था पलायन?
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दरअसल, 1990 के दशक में आतंकवाद के बढ़ने के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी. आंकड़ों के मुताबिक करीब 57,000 परिवार विस्थापित हुए थे, जिनमें ज्यादातर पंडित समुदाय से थे. यह पलायन कश्मीर की सामाजिक संरचना के लिए एक गहरा झटका था, जिसका असर आज भी महसूस किया जाता है. ऐसे में अब्दुल्ला का यह बदलता रुख एक सकारात्मक संकेत दे रहा है कि अब कश्मीर में हर धर्म और जाति के लोग वापस लौट सकें.
नशे के खिलाफ सख्त एक्शन
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दूसरी तरफ, जम्मू-कश्मीर प्रशासन भी एक गंभीर समस्या पर फोकस कर रहा है. उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने नशे के बढ़ते कारोबार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने साफ कहा कि नशीले पदार्थों का कारोबार केवल सामाजिक बुराई नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आतंकवाद से भी है. उनका मानना है कि यह एक सोची-समझी साजिश है, जिसका मकसद युवाओं को कमजोर करना और आतंक को बढ़ावा देना है.
‘3-P’ रणनीति क्या है?
इसी दिशा में 11 अप्रैल से एक खास '3-P' रणनीति लागू की गई है. इसमें ड्रग सप्लाई चेन और नारको टेरर नेटवर्क को खत्म करना, शिक्षा के जरिए लोगों को जागरूक करना और नशे के शिकार युवाओं का इलाज व पुनर्वास करना शामिल है. यह अभियान प्रधानमंत्री के नशा मुक्त भारत अभियान को भी मजबूती देता है और इसे जमीनी स्तर तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है. जन आंदोलन बनता अभियान अच्छी बात यह है कि यह पहल अब सिर्फ सरकारी दायरे तक सीमित नहीं रही, बल्कि जन आंदोलन का रूप लेती जा रही है. प्रशासन, पुलिस और आम लोगों के बीच बेहतर तालमेल के कारण शुरुआती नतीजे भी सामने आने लगे हैं. खासकर सीमावर्ती इलाकों में सप्लाई चेन तोड़ने की दिशा में कदम उठाए गए हैं, जिससे आतंकवाद के फंडिंग नेटवर्क पर भी असर पड़ सकता है.
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बहरहाल, कश्मीर इस वक्त एक अहम मोड़ पर खड़ा है. एक ओर राजनीतिक बयानबाजी में बदलाव दिख रहा है, तो दूसरी ओर जमीनी स्तर पर सामाजिक सुधार की कोशिशें तेज हो रही हैं. अब देखना होगा कि क्या ये बदलाव लंबे समय तक टिकते हैं और क्या कश्मीर फिर से अपने पुराने सौहार्द और शांति की राह पर लौट पाता है.