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सुवेंदु ने कैसे उखाड़ा TMC का 'बरगद का पेड़', दिलचस्प है ममता के गुरुर को चुनौती देने की वो कहानी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सुवेंदु अधिकारी का सफर बेहद दिलचस्प रहा है. कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी नेताओं में गिने जाने वाले सुवेंदु आज बीजेपी का बड़ा चेहरा बन चुके हैं. साल 2020 में टीएमसी नेतृत्व से नाराजगी के बाद उन्होंने पार्टी से दूरी बना ली. अब उसी ममता को चुनौती देकर राज्य की सत्ता चलाएंगे.
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में सुवेंदु अधिकारी की किरदार कोई सामान्य नहीं है. कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी और भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले सुवेंदु आज उसी बंगाल में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके हैं. हालात ऐसे बदल गए कि अब वही सुवेंदु अधिकारी ममता को ना सिर्फ़ दो चुनावों में मात दिए बल्कि राज्य की कमान भी आने हाथों में ले चुके हैं लेकिन इस सफर के पीछे कई बड़े राजनीतिक मोड़, नाराजगी, रणनीति और संघर्ष की लंबी कहानी छिपी हुई है.
कैसे शुरू हुई बदलाव की कहानी?
साल 2020 का अक्टूबर महीना था. विधानसभा चुनाव नजदीक थे और तृणमूल कांग्रेस बाहर से मजबूत दिख रही थी. लेकिन पार्टी के अंदर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था. ममता बनर्जी के क़रीबी सुवेंदु अधिकारी पार्टी आलाकमान से नाराज़ चल रहे थे. पूर्वी मेदिनीपुर में मजबूत पकड़ रखने वाले सुवेंदु अधिकारी धीरे-धीरे पार्टी नेतृत्व से दूरी बनाने लगे थे. नंदीग्राम आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में शामिल सुवेंदु वही नेता थे जिन्होंने 2007 में वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया था. इसी आंदोलन ने ममता बनर्जी को बंगाल की सत्ता तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.
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अभिषेक बनर्जी के चलते बढ़ी दूरी
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समय के साथ टीएमसी के भीतर नई शक्ति के तौर पर अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ने लगा. पार्टी संगठन की कमान धीरे-धीरे उनके हाथों में जाती दिखाई दी. यही बात सुवेंदु अधिकारी को खटकने लगी. राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि सुवेंदु और अभिषेक के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है. दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच भी दूरी साफ दिखाई देने लगी थी. सुवेंदु ने सार्वजनिक मंचों से बिना नाम लिए कई बार ऐसे बयान दिए जिन्हें सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी पर हमला माना गया. उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का हवाला देते हुए कहा था कि 'मैं और मेरा' की राजनीति समाज को आगे नहीं ले जा सकती. इसके बाद उनकी सभाओं से ममता बनर्जी की तस्वीरें भी गायब होने लगीं. धीरे-धीरे संकेत साफ हो गया कि पार्टी के भीतर बड़ी दरार पड़ चुकी है.
इस्तीफों ने बढ़ाया सियासी तापमान
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नवंबर 2020 में हालात और ज्यादा बदल गए. सुवेंदु अधिकारी ने पहले हुगली नदी पुल आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया. इसके अगले ही दिन उन्होंने ममता सरकार के मंत्रिमंडल से भी इस्तीफा दे दिया. इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया. टीएमसी नेतृत्व लगातार उन्हें मनाने की कोशिश करता रहा. तत्कालीन टीएमसी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर और वरिष्ठ नेता सौगत राय को भी बातचीत के लिए भेजा गया. पार्टी को उम्मीद थी कि बातचीत से मामला संभल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सौगत राय ने बाद में कहा था कि सुवेंदु ने साफ कर दिया था कि अब साथ काम करना संभव नहीं है. इसके बाद दोनों पक्षों के बीच दूरियां और बढ़ गईं.
ममता का पलटवार और राजनीतिक टकराव
17 दिसंबर 2020 को सुवेंदु अधिकारी ने टीएमसी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर पार्टी से पूरी तरह नाता तोड़ लिया. दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने भी खुलकर प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा था कि तृणमूल कांग्रेस बरगद के पेड़ की तरह मजबूत है और दो-तीन नेताओं के जाने से पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा. उन्होंने बाहरी ताकतों और राजनीतिक साजिशों का भी जिक्र किया था. उस दौर में बंगाल की राजनीति पूरी तरह गर्म हो चुकी थी. बीजेपी लगातार राज्य में अपनी जमीन मजबूत करने में लगी थी और सुवेंदु अधिकारी उसके लिए सबसे अहम चेहरा बनकर उभरे.
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अमित शाह की मौजूदगी में थामा बीजेपी का दामन
19 दिसंबर 2020 का दिन बंगाल की राजनीति में बेहद अहम माना जाता है. मिदनापुर के कॉलेज ग्राउंड में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में सुवेंदु अधिकारी बीजेपी में शामिल हो गए. मंच पर पहुंचकर उन्होंने अमित शाह के पैर छुए और बीजेपी का झंडा थाम लिया. इसी पल ने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी. बीजेपी ने सुवेंदु अधिकारी को बंगाल में अपने सबसे बड़े रणनीतिकार के तौर पर इस्तेमाल किया. नंदीग्राम से लेकर पूरे राज्य तक उन्होंने पार्टी के संगठन को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई. लोगों के बीच उनकी पकड़ और जमीनी राजनीति की समझ बीजेपी के लिए सबसे बड़ी ताकत बन गई.
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बहरहाल, करीब छह साल के लंबे संघर्ष, रणनीति और लगातार मेहनत के बाद आज वही सुवेंदु अधिकारी बंगाल की सत्ता के सबसे बड़े चेहरे बन चुके हैं. कभी ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगी रहे सुवेंदु अब बीजेपी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. यही राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई भी है कि यहां रिश्ते और रास्ते दोनों वक्त के साथ बदल जाते हैं.