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‘RSS से मिलकर रहने का हम भारतीय निकाल सकते हैं रास्ता’, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने की संघ की तारीफ
थरूर ने RSS के मूल सिद्धांत अनुशासन और हिंदुत्व की विचारधारा को हाइलाइट किया. उन्होंने कहा, संघ को असहिष्णुता के एक रूढ़िवादी खांचे में सीमित कर देना उसे अनदेखा करना है.
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कांग्रेस जहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को खतरा मानती है वहीं, कांग्रेस के ही सांसद शशि थरूर संघ के विचारों की तारीफ कर रहे हैं. थरूर ने RSS की स्थापना के 101 साल पूरे होने पर एक लेख लिखा. जिसमें उन्होंने संघ के सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में संगठन के योगदान को सराहा.
शशि थरूर ने अपने लेख में RSS प्रमुख मोहन भागवत की तारीफ भी की. उन्होंने लिखा, ‘विजयदशमी (20 अक्टूबर, 2026) को RSS के शताब्दी समारोह के समापन के साथ 1925 में हिंदुओं के दमन के खिलाफ एक सांस्कृतिक प्रतिक्रिया के रूप में शुरू हुआ यह संगठन, देश की सबसे प्रभावशाली सामाजिक-राजनीतिक ताकतों में से एक बन गया है.’
RSS से जुड़े कौनसे सवाल पूछे?
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शशि थरूर ने RSS के बारे में आगे लिखा, यह 55,683 स्थानों पर 88,949 दैनिक शाखाएं चलाता है, जबकि इसकी ओर से प्रेरित 32 संगठनों में से एक, भारतीय जनता पार्टी, भारत में सत्ता में है. फिर भी, इसकी विरासत को लेकर काफी विवाद है. कई उदारवादियों और धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए, RSS के साथ बहिष्कार, सांप्रदायिकता और वैचारिक कट्टरता का इतिहास जुड़ा है.
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In today’s @the_hindu, on the occasion of the conclusion of the @RSSorg’s centennial celebrations, I ask if the organisation’s fundamental majoritarian bigotry is yielding to a more inclusive approach, and what it needs to do to prove that the evidence for its evolution is not just a set of superficial bromides for global consumption:
— Shashi Tharoor (@ShashiTharoor) ?ref_src=twsrc%5Etfw">October 21, 2026
हिंदू पहचान पर गर्व करने वाला संगठन
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थरूर ने RSS के मूल सिद्धांत अनुशासन और हिंदुत्व की विचारधारा को हाइलाइट किया. उन्होंने लिखा, संघ के समर्थकों के लिए यह अनुशासन, सेवा और हिंदू पहचान पर गर्व करने का प्रतीक है. अब सवाल दो तरह के हैं?
क्या RSS में बदलाव आ रहा है (क्या वास्तव में कोई 'RSS 2.0' मौजूद है)
क्या हम जैसे धर्मनिरपेक्ष भारतीय, इसके साथ मिलकर रहने का कोई रास्ता निकाल सकते हैं?
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कहां है असहमति और असहजता?
कांग्रेस सांसद ने जहां RSS की तारीफ की तो उससे जुड़े कुछ अपवाद और इतिहास के बारे में भी लिखा. उन्होंने कहा, 'धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी भारतीयों की RSS के प्रति असहजता बिना किसी आधार के नहीं है. संगठन के शुरुआती वर्षों में, स्वतंत्रता संग्राम से इसकी दूरी और इस पर इसकी खामोशी साफ तौर पर देखी जा सकती थी. जहां एक ओर कांग्रेस नेताओं ने गिरफ्तारियां दीं और औपनिवेशिक दमन सहा. वहीं, दूसरी ओर RSS ने अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी आंदोलन से खुद को दूर रखा. ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों में, अंग्रेजों के साथ RSS का रणनीतिक तालमेल और बंगाल सरकार में हिंदू महासभा का मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन, यह दिखाता है कि उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद के बजाय हिंदुओं को एकजुट करने को प्राथमिकता दी.’
अपने लेख में थरूर ने RSS को कुछ सांप्रदायिक विवाद याद दिलाए, जिसमें संगठन का नाम आया था. हालांकि उन्होंने संघ की भूमिका को असहिष्णुता के एक रूढ़िवादी खांचे में सीमित करने को गलत माना. उन्होंने कहा,
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‘RSS को केवल असहिष्णुता के एक रूढ़िवादी खांचे में सीमित कर देना, समाज में इसके व्यापक और विविध योगदान को अनदेखा करने जैसा है. बंटवारे के समय हुए दंगों में, RSS के स्वयंसेवकों ने हिंदू और सिख शरणार्थियों की सुरक्षा, बचाव और पुनर्वास में अहम भूमिका निभाई थी, खासकर पंजाब में.’
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने संघ के राष्ट्रीय संकट के समय में योगदान को याद किया. उन्होंने लिखा, युद्ध, भूकंप, बाढ़ या भूस्खलन इस संगठन और इसकी समाज सेवा शाखा 'सेवा भारती' ने बहुत तेजी और प्रभावी ढंग से काम किया है और कई बार तो सरकारी तंत्र से भी आगे निकल गए हैं.
शिक्षा में RSS ने कैसे निभाई बड़ी भूमिका?
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अपने लेख में शशि थरूर ने RSS की ओर से संचालित विद्या भारत स्कूलों की तारीफ की. उन्होंने लिखा, 'विद्या भारती स्कूलों और 'एकल विद्यालयों' के ज़रिए, संघ ने दूर-दराज़ के आदिवासी इलाकों में बुनियादी साक्षरता पहुंचाने का काम किया है. इसके स्वास्थ्य शिविरों, रक्तदान अभियानों और परोपकारी कार्यों की तो वैचारिक विरोधियों ने भी तारीफ़ की है. कई भारतीयों के लिए, ख़ासकर छोटे शहरों और गांवों में, RSS कोई राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जो ठोस सेवाएं और नैतिक अनुशासन प्रदान करता है.’
थरूर ने की मोहन भागवत की तारीफ
तमाम अपवादों और बदलते पैटर्न, विचारों, नजरिए और संघ के रुख को कांग्रेस सांसद ने सकारात्मक और सुलहपूर्ण रुख बताया. थरूर ने लिखा, यह दोहरापन एक तरफ वैचारिक कट्टरता, तो दूसरी तरफ वास्तविक नागरिक भागीदारी. लंबे समय से पर्यवेक्षकों को उलझन में डालता रहा है. लेकिन हाल के वर्षों में एक अधिक सुलहपूर्ण रुख की ओर बदलाव के संकेत मिले हैं. इसके लिए उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत की भूमिका को अहम माना और उनकी सराहना की.
'मोहन भागवत के नेतृत्व में RSS ने काफी नरम रुख अपनाया है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से भारत में इस्लाम की जगह को स्वीकार किया है ('इस्लाम भारत आया और भारत में ही रहेगा') और हिंदुओं को धार्मिक उकसावे से बचने की सलाह दी है. उन्होंने हिंदुओं से यह भी कहा कि 'हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजना बंद करें' जो कि उनके पहले के आक्रामक बयानों से एक बड़ा बदलाव है. अब उनका नेतृत्व 'हिंदू राष्ट्र' की व्याख्या बहुसंख्यक शासन के रूप में नहीं, बल्कि एक समावेशी सभ्यतागत मूल्यों के रूप में करता है.’
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शशि थरूर ने RSS के सोशल मीडिया और सड़कों पर उतरने के रिकॉर्ड को कमजोर माना. जिससे 35 साल से कम उम्र के युवाओं के बीच संघ के लिए सोच इतनी डेवलप नहीं हुई. उन्होंने लिखा, जो भारतीय 35 साल से कम उम्र के हैं और वे RSS को इस आधार पर परखेंगे कि वे उसे सड़कों पर और अपने फ़ोन पर क्या करते हुए देखते हैं. इस पैमाने पर देखें तो RSS का रिकॉर्ड बहुत कमजोर है. मीम पेज, ट्रोल आर्मी और ऐसे लोग जो खुद कानून हाथ में ले लेते हैं (विजिलेंटे), ये सब भागवत की बातों के ठीक उलट काम करते हैं, और वह भी हिंदुत्व के नाम पर, इनकी संख्या बढ़ती ही गई है, और ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जहां RSS ने सार्वजनिक रूप से इनसे किनारा किया हो, या इन्हें अनुशासित करने की कोई कार्रवाई की हो.
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कांग्रेस सांसद ने लिखा, 101 साल की उम्र में यह संगठन और हमारा देश, दोनों ही एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जो राजनीतिक भी है और सभ्यतागत भी. हालांकि अब RSS का लहज़ा पहले से नरम है और उसका दायरा भी बढ़ा है, लेकिन संघ के इकोसिस्टम में मौजूद कुछ तत्व अभी भी नफरत और भेदभाव को बढ़ावा दे रहे हैं. जैसे-जैसे विभिन्न संस्थाओं में RSS का प्रभाव बढ़ रहा है, धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) भारतीयों के सामने एक बड़ी दुविधा खड़ी हो गई है.