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स्कूलों में छात्राओं को फ्री पैड देना होगा जरूरी, वरना रद्द हो जाएगी मान्यता, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, लड़कियों के शरीर को बोझ की तरह देखा गया, जबकि इसमें उसकी कोई गलती भी नहीं. ये बराबरी के अधिकार को प्रभावित करता है.

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30 Jan 2026
( Updated: 30 Jan 2026
12:47 PM )
स्कूलों में छात्राओं को फ्री पैड देना होगा जरूरी, वरना रद्द हो जाएगी मान्यता, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Supreme Court on Menstrual Health: पीरियड्स (माहवारी) को लेकर समाज की सोच बदली है, लेकिन आज भी इसके बारे में खुलकर बात नहीं की जाती. स्कूलों में छात्राओं को आज भी झिझक और भेदभाव का सामना करना पड़ता है. कई बार तो पीरियड्स के दौरान छात्राओं को क्लास भी छोड़नी पड़ जाती है. छात्राओं की इसी पीड़ा को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. 

सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं की गरिमा और स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए सभी स्कूलों को बड़ा आदेश दिया है. अब सभी सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में छात्राओं को फ्री में बायो-डिग्रेडेबल सैनिटरी पैड्स देने होंगे. अगर प्राइवेट स्कूल ऐसा नहीं करते हैं तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी. कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस आदेश को सख्ती से लागू करने को कहा है. इसके साथ ही कोर्ट ने स्कूलों लड़के-लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट बनाने और दिव्यांगों के लिए अलग टॉयलेट बनाने के भी निर्देश दिए. 

‘सरकारें होंगी जिम्मेदार’

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने एक जनहित याचिका पर ये बड़ा फैसला सुनाया है. बेंच ने सख्त लहजे में कहा, अगर प्राइवेट स्कूल ऐसा नहीं करते हैं तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी. कोर्ट ने इसे सुविधा के साथ-साथ छात्राओं का मौलिक अधिकार बताया. बेंच ने सभी केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों की स्कूलों में इसे लागू करने का आदेश दिया, साथ ही कहा, अगर सरकारें टॉयलेट्स और फ्री पैड्स की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कर पाती हैं, तो इसके लिए उन्हें ही जवाबदेह ठहराया जाएगा. 

बेंच ने फैसला सुनाते हुए समाज को आईना दिखाने वाली टिप्पणी की है. उन्होंने घर से लेकर स्कूल और पब्लिक प्लेस तक पीरियड्स पर लोगों के नजरिए, सुविधाओं के अभाव और लड़की की स्थिति पर चिंता जताई. 

बेंच ने कहा, यह आदेश सिर्फ कानूनी व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए नहीं है. यह उस सिचुएशन के लिए है जहां, लड़कियां मदद मांगने में झिझकती हैं. जहां टीचर्स चाहकर भी संसाधनों के अभाव में उनकी मदद नहीं कर पाते, जहां माता-पिता बच्ची के मासिक धर्म पर चुप्पी को नहीं समझ पाते और नहीं जानते की इसका क्या असर होता है. 

बेंच ने यह भी कहा कि यह समाज के लिए भी है, ताकि प्रगति का पैमाना इस बात से तय हो कि हम अपने सबसे कमजोर वर्ग की कितनी सुरक्षा करते हैं. हम हर उस बच्ची तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं, जो स्कूल मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) के कारण  नहीं आ पाती, क्योंकि उसके शरीर को बोझ की तरह देखा गया, जबकि इसमें उसकी कोई गलती होती भी नहीं है. 

कोर्ट ने इन दो तथ्यों से समझाई गंभीरता 

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने दो सवाल पूछकर मामले की गंभीरता और बराबरी के हक को परिभाषित किया. 

बेंच का पहला तथ्य था कि अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) का उल्लंघन है. कोर्ट ने समझाया कि अगर लड़कियों को सैनिटरी पैड नहीं मिलते तो वे लड़कों की तरह बराबरी से पढ़ाई और गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पातीं. 

वहीं, बेंच ने ये भी कहा कि मासिक धर्म के दौरान सम्मानजनक सुविधा मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का हिस्सा है. इस सुविधा का अभाव उऩकी गरिमा और निजता को भी प्रभावित करता है. 

सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने दो टूक पूछा, क्या ऐसी सुविधाओं की कमी मुफ्त और ‘शिक्षा के अधिकार’ (Right To Education Act) का उल्लंघन है? सरकारी और निजी सभी स्कूलों को RTE कानून का पालन करना होगा. अगर नियमों का उल्लंघन हुआ तो स्कूल की मान्यता रद्द हो सकती है. 

कोर्ट ने साफ किया है, मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है. 

कौन हैं याचिकाकर्ता और क्या है पूूरा मामला? 

सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका पर ये बड़ा फैसला सुनाया है. जया ठाकुर ने साल 2024 में अदालत में याचिका लगाई थी. जिसमें लड़कियों के स्वास्थ्य सुरक्षा (खासकर तौर पर मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) पर चिंता जताई थी. 

याचिका में जया ठाकुर ने बताया था कि पीरियड में होने वाली दिक्कतों के कारण कई लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं. उनके परिवार आज भी पैड का खर्चा नहीं वहन कर पाते. ऐसे में बच्चियों को कपड़े का इस्तेमाल करना पड़ता है इस हालत में वह स्कूल नहीं जा पाती. इसके साथ ही कपड़े का इस्तेमाल उनके स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है. अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दें और बताएं कि इस फैसले को जमीन पर कैसे लागू किया गया है. साथ ही, कोर्ट ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय स्तर पर एक नीति बनाने को भी कहा है ताकि देशभर में एक समान व्यवस्था लागू हो सके.

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जया ठाकुर ने केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को पूरे भारत में लागू करने की मांग की गई थी. उन्होंने याचिका में स्कूलों में फ्री पैड नहीं दिए जाने का मुद्दा उठाया था. अदालत ने अब जया ठाकुर और छात्राओं की चिंता को न केवल समझा बल्कि हाइजीन को लेकर स्कूलों और सरकारों को उनकी जिम्मेदारी भी समझा दी. कोर्ट का ये फैसला लड़कियों की सेहत ही नहीं बल्कि गरिमा के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा. 

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