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Harish Rana Died: 13 साल से कोमा में थे हरीश राणा, इच्छामृत्यु की इजाजत के 13 दिन बाद AIIMS में ली अंतिम सांस

देश में पहली बार हरीश राणा के केस में सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी. फैसले के 13 दिन बाद हरीश राणा इस दुनिया से मुक्त हो गए. इस केस ने सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी रुला दिया था.

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Harish Rana Death: 13 साल तक कोमा में रहने के बाद हरीश राणा को आखिरकार मुक्ति मिल गई. देश में पहली बार इच्छामृत्यु पाने वाले हरीश राणा का AIIMS में निधन हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी. हरीश राणा साल 2013 से कोमा में थे और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे. 

हरीश राणा का केस ऐसा मामला है जिसमें पहली बार किसी को इच्छा से मरने की इजाजत मिली है. 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरीश राणा को दिल्ली AIIMS शिफ्ट किया गया था. फिर AIIMS प्रशासन ने पहले पानी का पाइप और फिर खाने की ट्यूब हटा दी थी. जिससे हरीश राणा की फीडिंग रुक गई थी. यानी AIIMS ने हरीण राणा को जिंदा रखने के लिए दिया जा रहा बाहरी सपोर्ट और इलाज हटा दिया था. 

फैसला सुनाते वक्त भावुक हो गए थे सुप्रीम कोर्ट के जज

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सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को फैसला सुनाते वक्त कहा था, हरीश राणा के माता-पिता ने कई साल तक अपने बेटे की निस्वार्थ देखभाल की. उनका परिवार कभी भी उनका साथ देने से पीछे नहीं हटा. हरीश राणा के पिता और परिवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पादरीवाला भावुक हो गए. जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि यह बेहद दुखद है. यह हमारे लिए मुश्किल फैसला है, लेकिन इस लड़के (हरीश) को यूं अपार दुख में नहीं रख सकते. हम उस स्टेज में है, जहां हमें आखिरी फैसला लेना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिवार की प्रशंसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि उनके परिवार ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा. किसी से प्यार करने का मतलब है, सबसे बुरे समय में भी उनकी देखभाल करना.

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कोर्ट में हरीश राणा के माता-पिता ने क्या कहा था? 

फैसले के बाद मां निर्मला देवी ने कहा था, ‘बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किए. बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया और कई डॉक्टरों से इलाज भी कराया, लेकिन उम्मीदें लगभग खत्म हो गई हैं. अब तो बस भगवान से यही प्रार्थना है कि उसे इस पीड़ा से जल्द मुक्ति मिल जाए.’ कोर्ट के फैसले के बाद हरीश राणा के माता-पिता ने बेटे के अंगदान का फैसला लिया था. 

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हरीश राणा की मृत्यु से पहले माता-पिता की लगातार काउंसिलिंग की जा रही थी. किसी भी माता-पिता के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था. जिसमें एक लाचार पिता अपने बेटे के मरने की अर्जी लेकर आया हो, क्योंकि उनका बेटा 13 साल से जिंदा लाश बना था. बेहोश शरीर जिसमें कोई हरकत नहीं. देश के बड़े हॉस्पिटल में इलाज चला लेकिन कोई भी उन्हें ठीक नहीं कर सका. हरीश राणा के माता-पिता केवल और केवल उनके लिए सुकून भरी मौत चाह रहे थे. ताकि बेटे को तकलीफदेह जिंदगी से आजादी मिल जाए. 

हॉस्टल से गिरे थे हरीश राणा 

32 साल के हरीश राणा गाजियाबाद के रहने वाले थे. साल 2013 में चंडीगढ़ में वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. एक दिन उनके साथ बड़ा हादसा हो गया जिसने न केवल उनकी जिंदगी बदल दी बल्कि उनके लिए जिंदगी को बोझ बना दिया. हरीश राणा हॉस्टल की चौथी मंजिल की बालकनी से नीचे गिर गए. सिर में गंभीर चोट लगी और वह कभी होश में नहीं आए. 

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हरीश राणा 13 साल से बिस्तर पर थे, वह न चल सकते हैं न बोल सकते हैं न ही अपना दर्द बयां कर सकते हैं, लेकिन इस साइलेंस में कितनी दर्दभरी चीख दबी हुई थी. इसका अंदाजा जब मां-बाप को होता तो वह फफक पड़ते. अब सबको माफ करते हुए और माफी मांगते हुए हरीश राणा इस दुनिया और अपने दर्द से हमेशा के लिए मुक्त हो गए. 

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