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SC/ST Act पर कलकत्ता HC की सख्त टिप्पणी... एक मामले की सुनवाई में कहा- हर अपमान नहीं है अत्याचार, जानें पूरा मामला

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत हर अपमान अत्याचार नहीं माना जा सकता, जब तक सार्वजनिक रूप से धमकी या अपमान साबित न हो. कोर्ट ने माना कि कई मामलों में आरोप सच मान लेने पर भी वे SC/ST एक्ट की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं करते.

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कोलकाता से SC/ST Act को लेकर एक अहम खबर सामने आई है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में साफ किया है कि अनुसूचित जाति के किसी सदस्य के साथ हुआ हर अपमान अपने आप में अत्याचार नहीं माना जाएगा. अदालत ने कहा कि जब तक कथित अपमान सार्वजनिक रूप से, जानबूझकर और जाति के आधार पर न किया गया हो, तब तक उसे SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध नहीं ठहराया जा सकता.

क्या है पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह विवाद एक शैक्षणिक संस्थान से जुड़ा है. दरअसल, याचिकाकर्ता संस्कृत विषय में बीए, एमए और पीएचडी कर चुकी हैं और संस्कृत कॉलेज एंड यूनिवर्सिटी में विभाग प्रमुख के पद पर कार्यरत हैं. शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से हैं और वहीं असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हैं. असिस्टेंट प्रोफेसर ने आरोप लगाया कि विभाग प्रमुख उन्हें विभागीय फैसलों में शामिल नहीं करती थीं. उनकी कक्षाएं रोकी गईं. उन्हें परीक्षा ड्यूटी नहीं दी गई. साथ ही ऑनलाइन बैठक के दौरान कथित रूप से उनका अपमान किया गया. शिकायतकर्ता का दावा था कि यह सब उनकी जाति पहचान को देखते हुए किया गया, जिससे उन्हें मानसिक पीड़ा हुई. मामले की सुनवाई जस्टिस चैताली चटर्जी दास की एकल पीठ के सामने हुई. जांच के बाद पुलिस ने SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत चार्जशीट दाखिल की और समन जारी किए गए. इसके बाद विभाग प्रमुख ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कार्यवाही को चुनौती दी.

अदालत ने जांच में क्या पाया?

अदालत ने शिकायत और केस डायरी का बारीकी से अध्ययन किया. कोर्ट ने पाया कि आरोप मुख्य रूप से विभाग के भीतर प्रशासनिक और पेशेवर मतभेदों से जुड़े हैं. कहीं भी यह स्पष्ट उल्लेख नहीं था कि सार्वजनिक स्थान पर जाति-आधारित गाली-गलौज या अपमान किया गया हो. धारा 3(1)(r) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह जरूरी है कि अपमान जानबूझकर किया गया हो, वह जाति के आधार पर हो और घटना पब्लिक व्यू में घटी हो. अदालत ने कहा कि शिकायत में ऐसा कोई ठोस विवरण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपित ने जानबूझकर जाति के आधार पर अपमान या धमकी दी.

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र किया. इनमें गोरीगे पेंटैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य और स्वर्ण सिंह बनाम राज्य शामिल हैं. इन फैसलों में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि धारा 3(1)(r) के तहत अपराध तभी बनता है जब आरोपी SC/ST समुदाय का सदस्य न हो, अपमान या धमकी जानबूझकर दी गई हो, उसका उद्देश्य जाति के आधार पर हो और घटना सार्वजनिक दृष्टि में हुई हो. कलकत्ता हाईकोर्ट ने इन्हीं सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि केवल कार्यस्थल पर मतभेद या प्रशासनिक विवाद को SC/ST Act के दायरे में लाना उचित नहीं है, जब तक कि उसमें जाति-आधारित सार्वजनिक अपमान का स्पष्ट तत्व मौजूद न हो

अदालत ने अपने फाइनल में क्या कहा? 

अदालत ने माना कि इस मामले में अभियोजन जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा. शिकायत में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ता को केवल उनकी जाति के कारण निशाना बनाया गया. परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने चार्जशीट को रद्द कर दिया.

बताते चलें मौजूदा सामाजिक परिस्थिति को देखते हुए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह SC/ST Act की संवेदनशीलता और उसकी कानूनी सीमाओं दोनों को संतुलित तरीके से सामने लाता है. एक ओर कानून दलित और आदिवासी समुदाय की सुरक्षा के लिए बना है, वहीं दूसरी ओर अदालत ने स्पष्ट किया कि इसके प्रावधानों का उपयोग तथ्यों और आवश्यक शर्तों के आधार पर ही किया जाना चाहिए. यह निर्णय आने वाले समय में ऐसे मामलों में मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है. 

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