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हमास से लेकर ISIS तक... तुर्की बन रहा है टेरर फंडिंग का हब, भारत की रिपोर्ट से हुआ खुलासा

भारत ने एक अहम खुफिया रिपोर्ट के जरिए तुर्की की आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों का पर्दाफाश किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि तुर्की न केवल पाकिस्तान बल्कि अल-कायदा, ISIS और हमास जैसे आतंकी संगठनों को भी समर्थन दे रहा है. इस कूटनीतिक कदम ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तुर्की की छवि को चुनौती दी है.

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तुर्की जो दुनिया में खुद को आतंक के खिलाफ सख्त और जिम्मेदार देश के रूप में पेश करता है, अब उसी की नीतियां संदेह के घेरे में हैं. भारत ने कूटनीतिक रूप से तुर्की की कमजोर नस पर हाथ रखते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी दोहरी भूमिका को उजागर कर दिया है. खुफिया रिपोर्ट्स के हवाले से सामने आया है कि तुर्की न केवल पाकिस्तान के आतंक समर्थक नेटवर्क को समर्थन दे रहा है, बल्कि खुद अल-कायदा, ISIS और HTS जैसे खूंखार संगठनों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मदद दे रहा है.

ऑपरेशन सिंदूर से खुली तुर्की-पाकिस्तान की सांठगांठ

जब भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के तहत पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, तब तुर्की न केवल पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आया बल्कि भारत के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने में भी आगे रहा. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने पाकिस्तान को क्लीन चिट देने की कोशिश की और भारत के सैन्य ऑपरेशन की आलोचना की. इससे भारत ने भी कूटनीतिक अंदाज़ में पलटवार किया और कुर्द विद्रोहियों के बहाने तुर्की की आतंकी संगठनों से करीबी को उजागर किया.

आतंकियों की सुरक्षित पनाहगाह बना तुर्की?

रिपोर्ट्स के अनुसार, तुर्की ने हमास जैसे आतंकी संगठन के नेताओं को न सिर्फ शरण दी है, बल्कि उन्हें राजनीति करने के लिए मंच और फंडिंग भी दी है. 2024 में राष्ट्रपति एर्दोआन की हमास प्रमुख इस्माइल हनिया से मुलाकात के दौरान उन्हें तुर्की में मुख्यालय खोलने का ऑफर तक दिया गया. यह वही तुर्की है जो खुद को नाटो का हिस्सा और लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थक कहता है, लेकिन व्यवहार में आतंकियों के लिए ज़मीन तैयार करता है.

आतंकी फंडिंग का ग्लोबल सेंटर बनता जा रहा है तुर्की

तुर्की की कुछ कंपनियां और संस्थाएं अब सीधे तौर पर आतंकी गतिविधियों से जुड़ी पाई गई हैं. "अल अमान कार्गो" नामक तुर्की कंपनी ईरान की IRGC के संपर्क में रहकर यमन के हूथियों तक हथियार और धन पहुंचाती रही है. इसके अलावा, "ट्रेंड GYO" जैसी कंपनियां जिनमें हमास की सीधी हिस्सेदारी है, वे आतंकी गतिविधियों की फंडिंग में लगी हैं. ये तथ्य न केवल तुर्की की अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं बल्कि NATO जैसे संगठनों की विश्वसनीयता पर भी प्रभाव डालते हैं.

भारत का कूटनीतिक वार और तुर्की की बौखलाहट

भारत का यह कदम तुर्की के लिए महज़ आलोचना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे आईना दिखाने जैसा है. एक ओर जहां भारत अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए आतंक के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करता है, वहीं तुर्की जैसे देश पाकिस्तान के साथ खड़े होकर पाखंड रचते हैं. भारत ने इस रिपोर्ट के ज़रिए न केवल आतंक के खिलाफ अपने रुख को मज़बूत किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी आगाह किया है कि आतंक के खिलाफ लड़ाई केवल दिखावे की नहीं, सच्चाई की होनी चाहिए.

भारत ने तुर्की की नीति को उजागर कर यह सिद्ध कर दिया है कि वह आतंक के खिलाफ न सिर्फ मोर्चे पर है, बल्कि कूटनीति के स्तर पर भी हर उस देश को घेरने में सक्षम है जो आतंक का परोक्ष समर्थन करता है. अब देखना यह है कि क्या NATO और अन्य वैश्विक मंच तुर्की की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हैं या फिर फिर से चुप्पी साध ली जाती है.

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