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51 शक्तिपीठों में क्यों खास हैं ये 5 मंदिर, जहां नवरात्र में दर्शन से मिलता है मां का आशीर्वाद

माता सती के जहां- जहां अंग गिरे वहां बने 51 शक्तिपीठ, नवरात्र के दौरान इन 51 शक्तिपीठों का दर्शन और पूजन करना सबसे ज्यादा फलदायी माना जाता है.

51 शक्तिपीठों में क्यों खास हैं ये 5 मंदिर, जहां नवरात्र में दर्शन से मिलता है मां का आशीर्वाद
Image Credit: AI Generated
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सनातन धर्म में नवरात्र का बहुत बड़ा महत्व है. इस बार शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर से हो चुकी है. नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में देशभर में माता आदिशक्ति के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है. इस दौरान 51 शक्तिपीठों का दर्शन और पूजन सबसे ज्यादा फलदायी माना जाता है. 

नवरात्र में क्यों खास हैं शक्तिपीठों के दर्शन?

मान्यता है कि नवरात्र में एक भी शक्तिपीठ के दर्शन से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में शक्ति पीठों का बहुत महत्व है. ये न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक भी हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार, जहां-जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए. आज भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका तक में कुल 51 शक्तिपीठ स्थित हैं. नवरात्र में इन पीठों पर विशेष पूजा, तंत्र साधना और मेले का आयोजन होता है.

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1. गायत्री शक्तिपीठ, राजस्थान
अजमेर से 11 किमी उत्तर-पश्चिम में पुष्कर के पास गायत्री पहाड़ के निकट स्थित है गायत्री शक्तिपीठ. मान्यता है कि यहां माता की कलाई गिरी थी. इसे मणिदेविक मंदिर भी कहते हैं. इसकी शक्ति गायत्री और शिव को सर्वानंद कहते हैं. यह मणिदेविका शक्तिपीठ और गायत्री मंदिर के नाम से ज्यादा विख्यात है. यहां पहुंचने के लिए अजमेर तक ट्रेन और बस की सुविधा आसानी से उपलब्ध है. अजमेर से पुष्कर के लिए टैक्सी या रिक्शा मिल जाता है. पुष्कर का निकटतम हवाई अड्डा जयपुर है.

2. श्री अंबिका शक्तिपीठ, विराट नगर, राजस्थान

राजस्थान के मध्य में स्थित श्री अंबिका शक्ति पीठ, देवी अंबिका को समर्पित एक पवित्र धार्मिक स्थल है, जो दिव्य स्त्री शक्ति का प्रतीक है. यह पवित्र मंदिर देश और दुनिया भर से भक्तों को आकर्षित करता है. राजस्थान के विराट नगर में स्थित पापड़ी के शांत गांव में बसा यह मंदिर 51 शक्ति पीठों में से एक है, और माना जाता है कि यहीं पर सती देवी के पैर का बायां अंगूठा गिरा था. ऐतिहासिक रूप से, पापड़ी को पाव पड़ी के नाम से जाना जाता था, जबकि विराट नगर प्राचीन मत्स्य साम्राज्य की राजधानी थी, जिस पर राजा विराट का शासन था. मनमोहक बीजाक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह पीठ ध्यान और प्रार्थना के लिए आदर्श शांत वातावरण प्रदान करता है और आंतरिक शांति की अनुभूति कराता है. इसका निकटतम हवाई अड्डा जयपुर है.

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3. चंद्रभागा शक्तिपीठ, गुजरात

चन्द्रभागा शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक होने के कारण नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में महत्वपूर्ण है. शाक्त दर्शन, जो देवी को सर्वोच्च शक्ति के रूप में मानता है, इस पीठ के महत्व को और भी बढ़ाता है. यह संदेश देता है कि नारी केवल सृष्टि का आधार नहीं, बल्कि शक्ति, ज्ञान और करुणा का भी प्रतीक है. शाक्त दर्शन में देवी को प्रकृति और पुरुष दोनों के रूप में माना जाता है. वह ब्रह्मांड की सृजन, पालन और संहार करने वाली शक्ति हैं. देवी के विभिन्न रूप जैसे दुर्गा, काली और लक्ष्मी शक्ति के अलग-अलग पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था. जूनागढ़ के पास ही हवाई अड्डा है और देश के हर हिस्से से यहां ट्रेनें और निजी बस सेवाएं आती हैं.

4. करवीरपुर या शिवहरकर शक्तिपीठ, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है करवीरपुर या शिवहरकर शक्तिपीठ, जहां माता की तीन नेत्र गिरी थीं. यहां की शक्ति महिषासुरमर्दिनी तथा भैरव क्रोधीश हैं. पुराणों में इसी कोल्हापुर को करवीर क्षेत्र कहा गया है, जिसका उल्लेख देवीगीता में मिलता है. शिवहरकराय ही वह स्थान है जहां स्वयं भगवान शिव को अपनी प्रियतमा के वियोग में तांडव करना पड़ा और जहां से देवी महिषासुरमर्दिनी के रूप में अवतरित होकर असुरों का संहार करने के लिए तैयार हुईं. यह केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि अनंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा और शिव-शक्ति के अविभाज्य संबंध का प्रतीक है. कोल्हापुर सड़क, रेल और वायु मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है.

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5. त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरा

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त्रिपुरा के उदयपुर के निकट राधा किशोरपुर गांव में माता का दायां पैर गिरा था. इसे त्रिपुर सुंदरी या माताबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर अगरतला से लगभग 55 किमी दूर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है जो कछुए के कूबड़ जैसी दिखती है, इसलिए इसे कूर्म पीठ भी कहा जाता है. यह असम के कामाख्या मंदिर के बाद उत्तर-पूर्वी भारत में सबसे अधिक दर्शन वाला मंदिर है और त्रिपुरा राज्य का नाम इसी मंदिर के नाम पर रखा गया है. इसका निर्माण महाराजा धान्य माणिक्य ने 1501 ईस्वी में बंगाली एक-रत्न शैली में करवाया था. निकटतम हवाई अड्डा अगरतला है और निकटतम रेलवे स्टेशन कुमारघाट है, जो अगरतला से 140 किमी दूर है.

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