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सिंदूर खेला : सुहागिन महिलाओं की खास रस्म, देवी के चेहरे पर पान के पत्ते को स्पर्श कराकर पोंछती हैं आंसू

'सिंदूर खेला' की परंपरा में विवाहित महिलाएं मां दुर्गा की प्रतिमा के चरणों और मस्तक पर सिंदूर अर्पित करती हैं. इसके बाद वे एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करती हैं. इस अनुष्ठान के दौरान पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श कर उन्हें भावपूर्ण विदाई दी जाती है. इस रस्म को 'देवी बोरोन' कहा जाता है.

Images Credits: AI/IANS
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नवमी तिथि के साथ ही शक्ति उपासना संपन्न हो गई है. दुर्गा पूजा के अंतिम दिन, 20 अक्टूबर को देशभर में धूमधाम से दशहरे का त्योहार मनाने की तैयारी की जा रही है. इस वर्ष पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा की गई. विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन से ठीक पहले बंगाल में 'सिंदूर खेला' की रस्म पूरी की जाती है. 

नवरात्र के दौरान मां दुर्गा अपने मायके अर्थात पृथ्वी लोक पर आती हैं

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के दौरान मां दुर्गा अपने मायके अर्थात पृथ्वी लोक पर आती हैं और विजयादशमी के दिन भगवान शिव के धाम लौट जाती हैं. इसी भाव के साथ दुर्गा पूजा के अंतिम दिन कई स्थानों पर विशेष विदाई अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं.

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क्या होती है 'देवी बोरोन' रस्म

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'सिंदूर खेला' की परंपरा में विवाहित महिलाएं मां दुर्गा की प्रतिमा के चरणों और मस्तक पर सिंदूर अर्पित करती हैं. इसके बाद वे एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करती हैं. इस अनुष्ठान के दौरान पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श कर उन्हें भावपूर्ण विदाई दी जाती है. इस रस्म को 'देवी बोरोन' कहा जाता है.

'सिंदूर खेला' रस्म की परंपरा लगभग 400 वर्षों पुरानी है

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देवी मां को सिंदूर चढ़ाने के बाद महिलाएं एक-दूसरे के माथे, गालों और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं और एक-दूसरे के सुहाग के सौभाग्य की कामना करते हैं. 'सिंदूर खेला' के दौरान महिलाएं पारंपरिक तौर पर लाल रंग की बॉर्डर वाली सफेद साड़ी और चूड़ी पहनती हैं. 'सिंदूर खेला' बंगाली संस्कृति में 'स्त्री शक्ति', एकता और उत्साह का प्रतीक है. 'सिंदूर खेला' रस्म की परंपरा लगभग 400 वर्षों पुरानी है. अब यह रस्म बंगाल ही नहीं, देश और विदेशों में बंगाली समुदायों के बीच पहुंच चुकी है.

धुनुची नृत्‍य भी धीरे-धीरे पूरे देश में मनाया जाने लगा है

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इस उत्सव में विधवा, किन्नर, या तलाकशुदा महिलाओं को शामिल नहीं किए जाने की परंपरा रही, लेकिन सामाजिक बदलाव के कारण कुछ वर्षों से सभी महिलाएं 'सिंदूर खेला' उत्सव में शामिल होती हैं. इस दौरान धुनुची नृत्य किया जाता है. धुनुची नृत्‍य भी धीरे-धीरे पूरे देश में मनाया जाने लगा है. मान्यता है कि इस नृत्य से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं. मां की विदाई के वक्त बंगाल में मुंबई में सेलिब्रिटी भी बड़े पैमाने पर 'सिंदूर खेला' रस्म का हिस्सा बनते हैं.

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