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इस गड़बड़ी के लिए सबसे पहले कौन जिम्मेदार है? जलवायु संकट पर पीयूष गोयल ने यूरोप को सुनाई खरी-खरी, देखें VIDEO
बर्लिन में पीयूष गोयल ने जलवायु संकट के लिए विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि कार्बन उत्सर्जन में बड़ी भूमिका निभाने वाले यूरोपीय देश भारत जैसे विकासशील देशों पर समान जिम्मेदारी नहीं थोप सकते.
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जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन को लेकर भारत और यूरोप के बीच बहस एक बार फिर चर्चा में है. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए भारत जैसे विकासशील देशों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है. उन्होंने जोर देकर कहा कि जलवायु संकट से निपटने के लिए सभी देशों की परिस्थितियों और उनके ऐतिहासिक योगदान को ध्यान में रखना जरूरी है.
मंत्री गोयल ने अपने संबोधन में सवाल उठाया कि औद्योगिक विकास के दौरान वातावरण में भारी मात्रा में कार्बन किसने छोड़ा और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में किन देशों की बड़ी भूमिका रही. उनका तर्क था कि जिन देशों ने लंबे समय तक जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत बनाया, उनकी जिम्मेदारी को नजरअंदाज करके भारत जैसे देशों पर समान बोझ डालना न्यायसंगत नहीं होगा. उन्होंने सबके सामने साफ़तौर पर वाल उठाते हुए कहा कि इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कौन है? ओजोन परत कहां क्षतिग्रस्त हुई? वायुमंडल में इतना सारा कार्बन किसने भेजा? इस कार्बन उत्सर्जन- या इस गड़बड़ी में आपका योगदान बहुत बड़ा है.
दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी, लेकिन उत्सर्जन में भारत का हिस्सा कम
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पीयूष गोयल ने भारत की आबादी और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसके योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का घर है, लेकिन वैश्विक उत्सर्जन में उसका हिस्सा तीन प्रतिशत से भी कम है. हालांकि, उत्सर्जन के आंकड़े इस बात पर निर्भर करते हैं कि उनकी गणना किस वर्ष, किस गैस और किस पद्धति के आधार पर की जा रही है. भारत की बड़ी आबादी को बिजली, परिवहन, उद्योग, भोजन और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है. देश को विकास की रफ्तार बनाए रखने के साथ पर्यावरण की सुरक्षा भी करनी है. मंत्री गोयल ने कहा कि भारत की विकास संबंधी जरूरतों को नजरअंदाज करके उससे ऐसे मानकों का पालन करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, जो पहले से विकसित अर्थव्यवस्थाओं की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाए गए हों. उन्होंने यूरोप के प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन का मुद्दा भी उठाया. उनके मुताबिक, भारत की तुलना में यूरोपीय देशों का प्रति व्यक्ति पर्यावरणीय प्रभाव काफी अधिक रहा है. इस बहस का मुख्य आधार यह है कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी तय करते समय केवल आज के उत्सर्जन को नहीं, बल्कि औद्योगिकीकरण के बाद से जमा हुए ऐतिहासिक उत्सर्जन को भी देखा जाना चाहिए.
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India is conscious of and committed to its role in climate action. https://t.co/ONx3nB0ik8
— Piyush Goyal (@PiyushGoyal) ?ref_src=twsrc%5Etfw">October 22, 2026
विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी का सवाल
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जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय बातचीत में विकसित और विकासशील देशों की जिम्मेदारी लंबे समय से अहम मुद्दा रही है. यूरोप और दूसरे औद्योगिक देशों ने अपने विकास के दौरान कोयले, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया. इससे औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक विकास को गति मिली, लेकिन वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा भी बढ़ी. कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें वातावरण में गर्मी को रोकती हैं. इनकी बढ़ती मात्रा से वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है, जिसका असर मौसम, खेती, जल संसाधनों और समुद्र के स्तर पर पड़ता है. भारत भी गर्मी की लहरों, अनियमित बारिश और दूसरी जलवायु संबंधी चुनौतियों से प्रभावित होता है. गोयल की दलील है कि भारत को पर्यावरण संरक्षण के साथ अपनी ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ता है. देश की करोड़ों आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए विकास जरूरी है. इसलिए जलवायु नीति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य और विकासशील देशों की वास्तविक जरूरतों के बीच संतुलन बना रहे.
स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की कोशिशें
भारत सरकार सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है. इसका उद्देश्य बिजली की बढ़ती मांग पूरी करने के साथ जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना है. इसके अलावा ऊर्जा दक्षता, संसाधनों के पुनः उपयोग और सर्कुलर इकोनॉमी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सर्कुलर इकोनॉमी का मतलब ऐसी आर्थिक व्यवस्था से है, जिसमें वस्तुओं और संसाधनों का अधिक समय तक इस्तेमाल किया जाए, कचरा कम पैदा हो और पुरानी सामग्री को दोबारा उपयोग में लाया जा सके. इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव आसान नहीं है. बिजली की लगातार बढ़ती मांग, ऊर्जा भंडारण की जरूरत और उद्योगों में नई तकनीक अपनाने की लागत जैसी चुनौतियां मौजूद हैं. ऐसे में भारत के लिए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है.
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यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स पर भारत की चिंता
पीयूष गोयल का बयान यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था यानी कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर भारत की चिंताओं के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है. यह व्यवस्था यूरोप में आयात होने वाले कुछ उत्पादों के उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन पर कीमत लगाने से संबंधित है. इसके दायरे में लोहा और इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली जैसी श्रेणियां शामिल हैं. यूरोपीय संघ का कहना है कि उसके उद्योगों को उत्सर्जन घटाने के लिए लागत उठानी पड़ती है. इसलिए आयातित उत्पादों पर भी कार्बन से जुड़ी लागत लागू करने से प्रतिस्पर्धा में संतुलन बनाने और कंपनियों को स्वच्छ तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिलेगी. भारत को आशंका है कि इस व्यवस्था से उसके निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है और यूरोपीय बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है. खासकर इस्पात और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्रों के कारोबार पर इसका असर महत्वपूर्ण हो सकता है.
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बहरहाल, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया को उत्सर्जन कम करना होगा, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी बना रहेगा कि इसकी लागत कौन उठाएगा. भारत की मांग है कि विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और विकासशील देशों की जरूरतों को उचित महत्व दिया जाए. पीयूष गोयल के बयान ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है. आने वाले समय में भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार वार्ता में कार्बन उत्सर्जन, निर्यात लागत और पर्यावरणीय नियम महत्वपूर्ण मुद्दे बने रह सकते हैं. असली चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है, जो पर्यावरण की रक्षा करे और विकासशील देशों के विकास के अवसरों को भी सीमित न करे.