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हेलीकॉप्टर बनाम हवाई जहाज... किसमें यात्रा करना ज्यादा जोखिम भरा? जानें क्या कहते हैं आंकड़े

रांची एयर एंबुलेंस हादसे और अंडमान में पवन हंस हेलीकॉप्टर की तकनीकी खराबी के बाद हवाई सुरक्षा पर सवाल उठे हैं. आंकड़ों के अनुसार हेलीकॉप्टर का एक्सीडेंट रेट करीब 9.84 प्रति 1 लाख उड़ान घंटे है, जबकि सामान्य विमान का 7.28 है.

Source: META AI

झारखंड के रांची में हाल ही में एक एयर एंबुलेंस हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया. इस दर्दनाक दुर्घटना में सात यात्रियों की मौत हो गई. वहीं मंगलवार सुबह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पवन हंस के एक हेलीकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ गई, हालांकि पायलट की सूझबूझ से सभी यात्री सुरक्षित बचा लिए गए. इससे पहले पिछले वर्ष अहमदाबाद में हुआ भयंकर विमान हादसे की तस्वीर आज भी लोगों को झकझोर कर रख देती है. इन घटनाओं के बाद आम लोगों के मन में एक सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि आखिर हेलीकॉप्टर ज्यादा सुरक्षित है या हवाई जहाज.

क्या कहते हैं आंकड़े?

एविएशन एक्सपर्ट्स के मुताबिक हवाई यात्रा कुल मिलाकर सड़क यात्रा से ज्यादा सुरक्षित मानी जाती है. लेकिन हेलीकॉप्टर और फिक्स्ड विंग एयरप्लेन के बीच सुरक्षा के आंकड़े अलग कहानी बताते हैं. सामान्य सिविल विमान का एक्सीडेंट रेट लगभग 7.28 प्रति 1 लाख उड़ान घंटे है. वहीं हेलीकॉप्टर का औसत एक्सीडेंट रेट करीब 9.84 प्रति 1 लाख उड़ान घंटे दर्ज किया गया है. यानी हेलीकॉप्टर का जोखिम लगभग 35% ज्यादा माना जाता है. बड़े कमर्शियल जेट जैसे एअर इंडिया और इंडिगो की श्रेणी अलग है. अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार बड़े कमर्शियल एयरक्राफ्ट में मौत की दर हर 2.7 मिलियन फ्लाइट में लगभग एक के बराबर है. इसका मतलब है कि यदि आप किसी बड़े जेट में सफर कर रहे हैं तो आप दुनिया के सबसे सुरक्षित परिवहन साधनों में से एक में यात्रा कर रहे हैं.

हेलीकॉप्टर का जोखिम ज्यादा क्यों?

हेलीकॉप्टर का डिजाइन और उसका ऑपरेशनल उपयोग इसे ज्यादा जटिल बनाता है. इसमें मेन रोटर, टेल रोटर और गियरबॉक्स जैसे कई संवेदनशील हिस्से होते हैं. इनमें से किसी एक में भी खराबी आने पर स्थिति तेजी से आपातकाल में बदल सकती है. इसके अलावा हेलीकॉप्टर आमतौर पर कम ऊंचाई पर उड़ते हैं. वे पहाड़ी इलाकों, इमारतों, पेड़ों और बिजली की लाइनों के पास काम करते हैं. इससे टक्कर या मौसम से जुड़ी दिक्कतों की आशंका बढ़ जाती है. एक फिक्स्ड विंग विमान की तुलना में हेलीकॉप्टर उड़ाना तकनीकी रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है. पायलट को लगातार संतुलन बनाए रखना पड़ता है और मौसम में हल्का बदलाव भी असर डाल सकता है.

ऑटोरोटेशन से मिलती है राहत

हालांकि जोखिम ज्यादा होने के बावजूद हेलीकॉप्टर पूरी तरह असुरक्षित नहीं हैं. यदि इंजन फेल हो जाए तो वे ऑटोरोटेशन तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में हवा के दबाव से रोटर ब्लेड घूमते रहते हैं और पायलट नियंत्रित इमरजेंसी लैंडिंग कर सकता है. अंडमान में पवन हंस के हेलीकॉप्टर की समुद्र में सफल इमरजेंसी लैंडिंग इसका ताजा उदाहरण है.

हाल के बड़े हादसे

हाल के वर्षों में कुछ बड़े एविएशन हादसे भी सामने आए हैं. एअर इंडिया के बोइंग 787 ड्रीमलाइनर से जुड़ा एक बड़ा हादसा अहमदाबाद में टेक ऑफ के तुरंत बाद हुआ था, जिसमें 241 लोगों की जान गई थी. यह घटना दिखाती है कि भले ही कमर्शियल एविएशन सांख्यिकीय रूप से सुरक्षित हो, लेकिन दुर्लभ हादसों में जानमाल का नुकसान ज्यादा हो सकता है क्योंकि विमान में यात्रियों की संख्या अधिक होती है. उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाकों में तीर्थ यात्रियों को ले जा रहे हेलीकॉप्टरों के साथ भी हादसे हुए हैं. खराब मौसम, ऊंचाई और सीमित लैंडिंग स्पेस ऐसे मिशनों को ज्यादा जोखिमपूर्ण बना देते हैं.

आखिर कौन ज्यादा सुरक्षित?

यदि केवल आंकड़ों के आधार पर तुलना की जाए तो बड़े कमर्शियल जेट सबसे सुरक्षित माने जाते हैं. हेलीकॉप्टर का एक्सीडेंट रेट अपेक्षाकृत ज्यादा है, खासकर तब जब वे चुनौतीपूर्ण इलाकों में मिशन आधारित उड़ान भरते हैं. छोटे चार्टर विमान भी बड़े जेट की तुलना में अधिक जोखिम वाले माने जाते हैं.

बताते चलें कि हवाई यात्रा सामान्य रूप से सुरक्षित है, लेकिन यात्रा का माध्यम, विमान का प्रकार, मौसम और ऑपरेशनल परिस्थितियां जोखिम को प्रभावित करती हैं. इसलिए किसी भी हादसे के बाद घबराने की बजाय तथ्यों को समझना ज्यादा जरूरी है.

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